Monday, April 2, 2018

झूठे थे पहले से ही या मक्कार अब हो गए हो

आज तुमने मान लिया
के तुम तब झूठे थे।
शक तो तब भी हुआ था तुम पर
फिर भी यकीन कर गए तुम पर।

आज तुमने माफी मांग ली,
अब हमें भी माफ कर दो।
यकीन किया था तुम पर,
हमारा वो विश्वास लौटा दो।

माफी का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा,
तुम्हारे झूठ को हम सच समझते थे।
खुद से हमारा ये शिकवा-गिला चलता रहेगा,
तुम्हारे झूठ को सच जो समझते थे।

तुमने अपना नकाब क्या उतारा,
दुनिया की नजरों से उतर गए।
हम तो फिर भी गैर हैं,
खुद से क्या नजरें मिला पाए?

शायद अब तुम अच्छे से मंझ गए हो,
झूठे थे पहले से ही या
मक्कार अब हो गए हो
बताना जरूर, ताकि विश्वास करने की गलती दोबारा न हो...

(C) दिगपाल सिंह जीना

Thursday, July 13, 2017

एक नाले की आत्मकथा

मैं नाला हूं।
लंबा-चौड़ा हूं और काला हूं।
मैं नाला हूं।

कभी बजबजाता हूं।
कभी गजगजाता हूं।
मैं नाला हूं।
लंबा-चौड़ा और काला हूं।

बाहें फैलाए यहां पड़ा हूं,
इंतजार में तुम्हारे खड़ा हूं।
कभी इस तरफ कदम तो बढ़ाओ
तुम्हें गले लगाने को आतुर खड़ा हूं।

आओगे जो तुम तो, गले लगा लूंगा
टांग टूटेगी तुम्हारी, मैं जिम्मेदारी लूंगा
अपने रंग में रंग दूंगा तुम्हें भी
इतना तुम्हें मैं प्यार दूंगा

सड़क पर फैला दिया जाता हूं बरसात से पहले,
निगम की मेहरबानी से विस्तार पाता हूं।
बारिश हो जाए तो कहने ही क्या,
आपकी देहरी तक को कालिख से रंग जाता हूं।

इस बार तुम्हारी इंद्रियों को अच्छे से परखूंगा,
आंखें देखेंगी मुझे, त्वचा महसूस करेगी और नाक सिकुड़ जाएगी।
इतनी बदबू फैलाऊंगा इस बारिश के मौसम में,
बेहोश करने के लिए एनस्थिसीया की जरूरत नहीं रह जाएगी।

दिल खोलकर तुम बारिश का स्वागत करना
मैं तुम्हारे इंतजार में रहूंगा,
जो तुम न आओगे, तो घर तक चला आऊंगा
शिकवा-शिकायत का तुम्हारे पास मौका नहीं छोडूंगा।

बीमारियां भी फैलाऊंगा और इल्जाम भी न लूंगा
तुमने ही तो मुझे पाल-पोशकर इतना बड़ा किया है
तुम्हारा कर्ज जरूर लौटाऊंगा,
तुम बाज आओगे नहीं, तुम्ही को तुम्हारा दिया लौटाऊंगा।

(C) दिगपाल सिंह

Tuesday, July 11, 2017

अमरनाथ यात्रा के दौरान आतंकियों के हाथों मारे गए भक्तों को श्रद्धांजलि

मैं तो बम भोले के नारे लगाता आया था,
पूरे उत्साह से बाबा तेरे दर्शनों को आया था।
हिमलिंग पर तेरे फूल-पाती चढ़ाने आया था,
अपने दुख-दर्द भूलकर तुझे नवाने आया था।

तेरे दर्शनों का सौभाग्य मुझे मिला,
जीवन का हर सुख मुझे मिला।
तेरे दर्शन करके मैंने सब कुछ पा लिया,
और फिर में घर की ओर चल दिया।

तेरी भक्ति रोम-रोम में बस गई थी,
रास्ते में 'शैतान' की संतानें खड़ी थीं।
गोलियों से छलनी कर दिया मेरा सीना
फिर भी दिल में मेरे तेरी ही तस्वीर पड़ी थी।


तेरा नाम लेते हुए मैंने आखिरी सांस ली,
शायद तेरी यही मर्जी थी।
मौत से पहले तेरे दर्शन हो गए,
ले बाबा हम हमेशा के लिए तेरे ही हो गए।

Saturday, July 8, 2017

पैरों में लिपटकर देहरी और फिर बेडरूम तक चली आयी...

कल तक मेरे मुंह लग रही थी, मुझे चिढ़ा रही थी
सिर पर चढ़कर मेरा 'जीना' मुहाल कर रही थी।
आज हालात थोड़ा मेरे पक्ष में क्या हुए,
पैरों में लिपटकर देहरी और फिर बेडरूम तक चली आयी।
इंसान ही नहीं, धूल का भी स्वभाव ऐसा होता है।।

Wednesday, November 30, 2016

सुधर जा... 'ये वक्त हमेशा नहीं रहेगा'

अब सुबह के साथ दिन होता है,
सूरज छिपने के साथ होती है रात।
ऐसी प्यारी भी जिंदगी होती है,
ऐसे में क्या करूं उस असंस्कारी की बात।

घोटालों के सरदार के साथ फंसा था,
उसने एक नया व्यापमं जो गड़ा था।
अभिमानी और ब्राह्मण दोनों था,
लेकिन रावण का अंश मात्र भी न था।

न जाने किसने उसे यहां तक पहुंचा दिया,
जैसे कीचड़ में रहने वाले जानवर को घर में पाल लिया।
मैं बस इतना कहूंगा, सुधर जा... 'ये वक्त हमेशा नहीं रहेगा'
मेरा बुरा नहीं रहा, तेरा हमेशा अच्छा नहीं रहेगा।

(C) दिगपाल सिंह

Thursday, November 10, 2016

आज फिर नई राह पर चल पड़ा हूं...

पुराने रास्तों से मुंह मोड़ चला हूं,
आज फिर नई राह पर चल पड़ा हूं।
नई सुबह है, नई राह और नई मंजिल भी
सूरज का दामन थाम, आगे बढ़ चला हूं।

उगते सूरज सी लालिमा चेहरे पर लिए
चढ़ते सूरज सी तपिश हौसलों में है,
कल की बात को कल में ही दफन कर
आज फिर नई राह पर चल पड़ा हूं।

अडिग-अचल हिमालय जैसे इरादे लिए
दिल में गंगा सी निर्मलता और आंखों में वेग लिए
अपने सागर की तरफ बढ़ चला हूं,
अपने हर अरमान का 'जागरण' कर चला हूं।

- (C) दिगपाल सिंह 

Friday, November 4, 2016

लगता है आज मैंने तुम्हारी मुहब्बत का बदला ले लिया है

तुम्हारी मुहब्बत में,
दिन कभी दिन न रहा।
न रात कभी रात रही,
न कभी मैं ही, मैं रहा।

तुम्हारे इश्क की छांव में,
दिन पल में गुजर गया।
रात आंखों में गुजरी,
मैं भी तुममें ही कहीं खो गया।

तुम्हें अपना बनाने की हसरत थी,
तुम्हारे ख़यालों से न फुरसत थी।
तुम्हारा दिल भी 'अजेय' था,
उसमें किसी और के लिए 'हरकत' थी।

तुम न सही, तुम्हारे नाम से दिल लगा लिया,
नाम को तुम्हारे खुद में आत्मसात कर लिया।
यहां भी मेरी मुहब्बत में एक 'कंकड़' अटक गया,
और मेरा प्यार फिर से अधर में लटक गया।

एक बार तुम मुझे छोड़ गई थी,
आज मैंने तुम्हारा नाम भी छोड़ दिया है।
दिल तोड़ गई थी तुम एक दिन,
लगता है आज मैंने बदला ले लिया है।