Tuesday, July 21, 2026

पिस्तौल-गोली सब तुम्हारी थी

 हमारा सिर्फ नारा था,

लाठी तुम्हारी थी।

हमारी कुछ मांगें थी,

पिस्तौल-गोली सब तुम्हारी थी।


हम तो शांति से चल रहे थे,

भगदड़ तुमने मचाई थी।

लाठी-डंडे खुद चलाकर

अफवाह भी तुमने ही फैलाई थी।


अब तक मांग रहे थे प्रधान का इस्तीफा,

अब पंत प्रधान का भी इस्तीफा मांगेंगे।

तुम्हारी डिक्शनरी में नहीं होगा जो

तुमसे उसी प्रश्न का जवाब मांगेंगे।

Wednesday, September 22, 2021

अपने संस्कार छोड़कर मैं, तुम्हारे जाहिल संस्कारों का हो गया

 हम जाहिल थे,

हम गंवार थे।

तुमने पूरी मेहनत की

हम मान भी गए तुम्हारी बात।


वक्त का पहिया घूमा

हमने अपने जाहिल संस्कार छोड़े।

तुमने जो कहा वो किया,

जमीन से अपने संबंध भी तोड़े।


गंगा स्थिर न रह सकी,

न जाने कितना पानी इसमें बह गया।

अपने संस्कार छोड़कर मैं,

तुम्हारे जाहिल संस्कारों का हो गया।


आज तुम मेरे उन्हीं संस्कारों की माला जपते हो,

जिन्हें मेरे गंवार होने का सर्टिफिकेट बताते थे।

कोयला आज तुम्हारा टूथपेस्ट है,

नमक से तुम्हारे दन्तमंजन का टेस्ट है।


जेल लगाना सिखा दिया तुमने मुझे,

आज खुद शैंपू में भी तेल मिलाते हो।

जिम की आदत लगाकर मुझे,

खुद योग में चैन की सांस पाते हो।

Monday, September 20, 2021

फिर नया आशियाना होगा, एक बार फिर नया ठिकाना होगा।

 नई उड़ान, नया सफर

मंजिल भी नई है।

उम्मीदें नई हैं, हौसले नए

उमंग भी तो नई है।


एक डाल से उड़ा पंछी,

दूसरी डाल पर जा बैठेगा।

फिर नया आशियाना होगा,

एक बार फिर नया ठिकाना होगा।


नई डाल की नई चुनौतियां,

नए रास्तों से रूबरू मिलना होगा।

पुराने रास्तों का प्रेम और

पुरानी डाल का अनुभव साथ होगा।


जीवन की सीख नई होगी,

नई रीत से मेल-जोल होगा।

बस यूं है ये रास्ता आगे बढ़ेगा,

पुरानी डाल का योगदान अनमोल होगा।

Thursday, September 16, 2021

नदी सा बहो तुम, तुम्हें तो नीले समंदर तक जाना है

 अभी तो ये पहला ही पड़ाव है,

पहाड़ से नदी का उथला बहाव है।

मंजिलें आएंगी राह में कितनी और,

मंजिल दूर है अभी, ये बस ठहराव है।


तुम्हें यू ही चलते जाना है,

तुम्हें यूं ही बहते जाना है।

रुकावटें भी आएंगी राह में,

तुम्हें उन्हें पीछे छोड़ते जाना है।


नदी सा बहो तुम,

सुनसान राहों में झरने भी आएंगे।

वीरान जंगल और चकाचौंध शहर भी आएंगे,

रुकना नहीं, ये तुम्हें मंजिल से भटकाएंगे।


तुम्हें बहते जाना है,

ये तो एक छोटा सा पड़ाव है।

मदमस्त होकर चलते चलो तुम,

तुम्हें तो नीले समंदर तक जाना है।


आसमान की बुलंदियां तुम्हारी हैं,

अभी तो मेहनत की बहुत तपिश झेलोगे

आग से डरना तुम्हारा काम नहीं,

जलोगे तभी तो धुंए की तरह आसमान छुओगे।

Wednesday, March 24, 2021

नेता निकला, वादे लाया, देखो फिर से चुनाव आया...

सुबह-सवेरे आता ट्वीट

चैनल-चैनल पर चलता ट्वीट

नेताजी के मन की भड़ास

सब तक पहुंचा आता ट्वीट

.........................

नेता निकला, वादे लाया,

देखो फिर से चुनाव आया।


आया बड़े-बड़े वादे लेकर,

जिताएंगे हम उन्हें वोट देकर।


जागो वोटर अब मत सोओ

लालच में आकर वोट मत देओ।

.........................


आंख हो गई तुम्हारी नम नम नम,

रुमाल लेकर दौड़े हम,

देर से जाना झूठे रोए थे तुम,

अब तुम्हारी हकीकत जान गए हम

.........................

देखो नेता सच्चा दिखता है, पर दिल से झूठ लगा रखा है...

देखो नेता सच्चा दिखता है, पर

दिल से झूठ लगा रखा है।

इसने ही तो झूठ बोल-बोल कर

हमको वर्षों से ठगा है।


नेता! नेता! सच बतलाओ

अब किसे ठगने आए हो?

बहुत दिनों के बाद आज फिर,

इस गली में आए हो।


क्या नारा है, अब क्या झूठ बोलते हो?

बतला दो नेता जी!

चुनाव आते देखकर,

फिर इस गली में आए हो जी।


नेता! यह झूठ बोलना क्या तुमने,

अपनी पार्टी से सीखा है?

पार्टी ने ही क्या तुमको झूठ,

बोलने का कोर्स कराया है?


गली-गली में झूठ बोलना, चिल्लाना

जिसने तुम्हें सिखाया है,

गली-गली झूठ का पुलिंदा

बांधकर आओ ये भी तुम्हें बताया है।


बड़े धूर्त हो, तुमने अपनी पार्टी की

बात सदा ही है मानी

इसलिए ही तो तुम हो गए हो

इतने मक्कार और अभिमानी।

विकास तुम कहां हो, तुम्हारी तलाश सबको है...

 विकास तुम कहां हो,

तुम्हारी तलाश सबको है।

नेताजी बोलते हैं हम लाए,

पर तुम कहीं नजर नहीं आए।


कोई कहता है तुम सड़क पर हो,

कोई तुम्हें बिल्डिंग में बताता।

भाई मेरे समझ में ये नहीं आता,

चुनाव के बाद तू चला कहां जाता।


तुम्हारी बात तो सब करते हैं,

चुनाव के बाद तुम्हें ही भूल जाते हैं।

नेता हिंदू-मुसलमान गाते हैं,

चुनाव जीतने पर तुम्हारे गुण गाते हैं।


विकास तुम कहां हो,

इस बार आना, तो दर्शन जरूर देना।

मंत्री से लेकर संतरी तक तुम्हारे मुरीद हैं,

एक झलक दिखला दो, चुनाव नजदीक हैं।

एक झूठा आता है, सब झूठों को ले आता है...

 एक झूठा आता है,

सब झूठों को ले आता है,

सच्चाई का उजियारा खो जाता है,

झूठ का बोलबाला हो जाता है।


ट्वीट करते हैं सब मिलजुल कर,

वायरल होते हैं उनके झूठे स्वर,

जहर बुझे तीर छोड़ते जो ट्वीट,

सुर्खियों में भी छा जाते वो ट्वीट।


सब झूठ का खेला है,

हर तरफ झूठों का रेला है,

नई खबर, नया कारोबार,

नई खबर पाते हैं अखबार।


जो झूठों का साथ देते हैं,

बदले में भरपूर माया पाते हैं,

तारीफ भली लगती उनको,

झूठ बोलना आता जिनको।


झूठ बोलने का मूड है,

सोशल मीडिया में जगह भरपूर है,

यहां भी अगर झूठ ना बोल पाए,

तो क्या बड़े नेता बन पाए।

हमारी नगरी में आए नेता जी

हमारी नगरी में आए नेता जी।

धड़ा-धड़ एक ही सुर में,

नारे लगाएं नेता जी।


चमचे देखो तालियां बजाएं,

और जोर से नारे लगाएं नेता जी।


एक सच और हजार झूठ बोलते हैं,

अपनी कहानी को सच्ची बताएं नेताजी।


झूठ उनका टपके टप-टप, टप-टप,

झूठ की बरखा बरसाएं नेताजी।


विरोधी बोले सब झूठ है सरकार,

झूठ का विस्तार करें नेताजी।


सभी जोर-जोर से ठहाके लगाएं,

ऐसे-ऐसे झूठ बोल जाएं नेताजी।

कोरोना बेटे, कोविड बेटे कहां गए थे

कोरोना बेटे, कोविड बेटे कहां गए थे,

दुनियाभर में लोगों को मार रहे थे,

अमेरिका ने वैक्सीन बनाई भाग रहे थे

इंडिया ने दवा बनाई सोच रहे थे,

अब कहां जाएंगे, जगह ढूंढ रहे थे,

चीन ने पैदा किया वहीं जा रहे थे,

वुहान वापस जाने की प्लानिंग कर रहे थे,

फिर से नया स्ट्रेन बना रहे थे

Tuesday, March 2, 2021

चिड़िया के घर का वर्णन आज के नजरिए से

सबसे पहले मेरे घर का

अंडे जैसा था आकार 

तब मैं यही समझती थी बस

इतना-सा ही है संसार। 


फिर मेरा घर बना दुकान का शटर

टिन की चादर से तैयार

तब मैं यही समझती थी बस

इतना-सा ही है संसार।


फिर मैं निकल गई बिल्डिंगों पर

ऊंची-ऊंची थीं जो बेकार

तब मैं यही समझती थी बस

इतना-सा ही है संसार।


आखिर जब मैंने आसमान में

उड़ने की कोशिश की हजार

हर तरफ बिल्डिंगें ही नजर आईं

पेड़-पौधों से धरती पायी बेजार


तब मेरी समझ में आया

बहुत ही नर्लज

बड़ा ही बेशर्म

है यह इंसान बड़ा ही बेकार।

(C) Digpal Singh Jeena

Thursday, July 30, 2020

बिखरा नहीं हूं, बस थोड़ा सा टूटा हूं...

बिखरा नहीं हूं,
बस थोड़ा सा टूटा हूं।
किसी ने रौंदा नहीं,
बस थोड़ा पीछे छूटा हूं।

फिर उड़ान भरुंगा,
फिर आसमान छुऊंगा।
पतंग की डोर थोड़े ही हूं
जो कटकर गिर जाऊंगा।

नई हमारी परवाज होगी,
मंजिलों से आवाज होगी।
तुम्हारा ही तो इंतजार था,
जीत वो लाजवाब होगी।

हम बिखरें भी तो,
जश्न-ए-बहारा होता है
बीज बनकर गिरते हैं और...
गुलशन का नजारा होता है।

तुम क्या तोड़ोगे हमें,
हम खुद ही टूट जाते हैं।
प्यार से कोई गले लगा ले बस
हमेशा के लिए उसके हो जाते हैं।

Friday, June 5, 2020

मैं बुलाऊंगा तुम्हें ऐ दोस्त तुम चले आना

मैं बुलाऊंगा तुम्हें ऐ दोस्त
तुम चले आना।
खुशियां जो पीछे छूट गईं थीं,
उन्हें साथ में लाना।
अकेले तुम्हें घर में एंट्री मिलेगी नहीं,
भाभी को भी संग लाना।

मैं बुलाऊंगा तुम्हें ऐ दोस्त
तुम चले आना।
खुशियां जो पीछे छूट गईं थीं,
उन्हें साथ में लाना।
आ ही रहे हो तो एक गठरी भरकर
बचपन की यादें भी लाना।
बचपन की यादों में खो जाएंगे हम,
कुछ पुराने किस्से ले आना।

खुशियां जो पीछे छूट गईं थीं,
उन्हें साथ में लाना।
तुम आओगे तो महफिल सजेगी,
दो बियर भी ले आना।

मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा

लौट आऊंगा मैं एक दिन,
फिर उत्सव मनाऊंगा।
नवरात्र पर व्रत-पूजा करके,
कंजक भी सजाऊंगा।

रक्षाबंधन के त्योहार में,
बहनों संग खूब प्यार लुटाऊंगा।
आएंगे कान्हा भी हमारे घर,
जन्माष्ठमी का त्योहार मनाऊंगा।

मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा।

सफाई के लिए जुटाऊंगा सबको,
स्वछता का मंत्र भी सिखाऊंगा।
फिर होगी दोस्तों संग हंसी-ठिठोली
लॉन्ग ड्राइव पर भी ले जाऊंगा।

गजनान को भी घर बुलाएंगे,
गणपति बप्पा मोरया चिल्लाऊंगा।
लौट आएगी वो खोई रंगत एक दिन
मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा।

बड़ा दुखी था मैं इस साल,
अगले बरस बिटिया का जन्मदिन धूम-धाम से मनाऊंगा।
कोरोना के रावण का दहन करके
हर्षोल्लास से दीपोत्सव मनाऊंगा।

बच्चों में खुशियां बांटने को,
सेंटा बनकर आऊंगा।
नए साल का स्वागत भी होगा
दोस्तों संग कुछ जाम भी छलकाऊंगा।

मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा।

पंचमी पर मां शारदा की पूजा कर,
तिल-कुट का भोग लगाऊंगा।
और फिर फाग में रंग-गुलाल उड़ाकर,
दोस्तों संग होली खूब मनाऊंगा।
मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा।

जी, बॉस दफ्तर भी आऊंगा
आपके साथ चाय पर चर्चा कर
बोर्ड रूम की लंबी मीटिंग में,
आगे का प्लान भी बनाऊंगा।

सुना था तू है, बचपन से मानता आया हूं के तू है

सुना था तू है,
बचपन से मानता आया हूं
के तू है।

तू है तो अपने होने का सुबूत दे
बचपन से ये मानता आया हूं
के तू है।

तू है तो क्यों भूखा मर रहा इंसान,
क्यों दर-बदर भटक रहा बेजान।
क्यों दाने-दाने वो मोहताज है,
इतने पर भी तुझे न लाज है?

मंदिर तेरे, मस्जिद तेरी
गुरुद्वारे और गिरिजाघर भी तेरे
फिर भी क्यों
भूखा पटरियों पर भूखे मर रहा इंसान

क्या तू भी अपने घर मैं कैद है?
क्या तुझे भी महामारी का डर है।
कहीं तू भी भूखा तो नहीं रह गया।
ले तू भी कुछ दिन का राशन ले जा।

मगर सुन, पैदल मत चल पड़ना,
अपने घर की तरफ
गर्मी बहुत है, पैर जल जाएंगे तेरे भी
रेल की पटरी से तो भी दूर रहना।

घर में तेरे भी कोई राह देखता होगा,
जो तिनका-तिनका बिखर गया,
सोच उसके घर वालों का क्या होगा?
तू भी ऐसे ही न मर जाना।

लड्डू-प्रसाद का भोग लगाया कभी,
कभी चढ़ावा भी चढ़ाया तेरे दर पर।
अब बारी तेरी है,
क्या ऐसे ही छोड़ देगा मुझे दर-बदर।

Tuesday, March 24, 2020

बस कर तू भी बावली ना हो जाना, ये नफरत नहीं तेरा प्यार है

आज वो बड़ी खुश है
या बड़ी ही व्याकुल
आंगन तक आ गई मेरी
कह रही है चल बाहर निकल।

सड़क वीरान है
चिड़िया वो नादान है
चिल्ला चिल्ला कर कह रही
चल लौंग ड्राइव पर चलें।

अधीर है बेचारी
समझ नहीं पा रही
मैं घर में क्यों पड़ा हूं
बाहर आने की जिद कर रही

अकेली नहीं
दूसरे साथियों को भी लाई है
सब आज कलरव करते हैं
जैसे मेरी गुलाम मजबूरी पर हंसते हैं।

या अपनी आजादी का जश्न मना रहे
मेरे जख्मों को कुरेद रहे
मै कैद हुआ तो हवा भी बावली हो गई
आंधी बनकर मुझे चिढ़ाने अंदर तक आ गई।

बस कर तू भी बावली ना हो जाना
ये नफरत नहीं तेरा, प्यार है चिड़िया
बिछड़कर मैं भी रोया हूं कभी बहुत
अब तू 'जीना' मत छोड़ देना चिड़िया।

(c) दिगपाल सिंह

Sunday, March 22, 2020

अजब ये संक्रमण काल है


रास्ते सूने, सड़कें सूनी हैं
अजब ये संक्रमण काल है।
हम भी, तुम भी घर में बंद हैं,
कोरोना आया बनकर काल है।

कंकर भी न हिला आज रास्ते से,
सड़कें भी विधवा सी सूनी हैं।
तुम घर में रहो, सदा खुश रहो
तुमसे देश को उम्मीदें दूनी हैं।

पंछी, नदिया सब आगे बढ़ गए
आज हम अपने ही घर की सीढ़ियां चढ़ गए।
रास्ते सूने, सड़कें सूनी हैं,
बता तो फिजाओं को हम भी जुनूनी हैं।

अब हमने रार ठान ली है,
काल के कपाल पर नई इबारत लिख देंगे।
यू न हमारी हस्ती को मिटा पाएगा कोई,
हर मुसीबत को राह से हटाकर ही मानेंगे।

(c) दिगपाल सिंह

Wednesday, February 26, 2020

ये कौन है जो पत्थर फेंक रहा, कौन है जो आग लगा रहा है

ये कौन है जो पत्थर फेंक रहा है,
इंसानियत को लहूलुहान कर रहा है।
ये कौन है जो आग लगा रहा है।
दुकानों ही नहीं भाईचारे को भी जला रहा है।

क्यों सड़कों पर बिखरा कबाड है,
क्यों दंगों से जिंदगी यूं बेजार है।
घर लौट जा तुझे भी कहता हूं मैं,
ये राह और उसके आगे मोड़ बेकार है।

कौन सा खुदा है जो पत्थर फेंकने को इबादत कहता है,
कौन वो भगवान है जो आगजनी पर खुश होता है।
कुछ लोगों के बहकावे पर भड़क जाती हैं भावनाएं तेरी,
'जीना' नहीं चाहता क्या, बहुत कीमती है जिंदगी तेरी-मेरी।

यूं न कर इंसानियत को शर्मसार,
चल फिर गले मिलते हैं मेरे यार।
तू ईद पर मुझे सेवईंया खिला
मैं होली पर रंग के तुझपर बरसाऊं प्यार।
@दिगपाल सिंह जीना

Friday, February 21, 2020

सबके भेद खुल गए, रंगे सियार धुल गए

सबके भेद खुल गए,
रंगे सियार धुल गए।
असली रूप में आए नजर
अब एक-एक होगा दर-बदर।

चेहरे से नकाब उतर गया,
गद्दारों का मुखड़ा दिख गया।
कोई भारत के टुकड़े कर रहा,
कोई दुश्मन जिंदाबाद कर गया।

जागी सतायों के लिए उम्मीद ऐसी,
घर और दिल में जगह दिलाएगा CAA-NRC
अब अपना भी हंसता खेलता परिवार होगा,
 देश की खुशहाली में मेरा भी अधिकार होगा।

ये खुशी गद्दारों को ना हज़म हुई,
विरोध के नाम पर देश तोड़ने की बात हुई।
और इस तरह रंगे सियार धुल गए,
भेद उनके सारे खुल गए।