Tuesday, March 8, 2011

गेम्स विलेज को लेकर एक और आइडिया है सरजी!


‘खेल खतम पैसा हजम!’ अरे नहीं, पैसा ऐसे कैसे हजम हो जाएगा? अभी तो मामला तन गया है और हाईकोर्ट तक बात पहुंच गई है जनाब। वैसे हम इस झमेले में नहीं फंसने वाले, हम तो बात करेंगे कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज के बारे में। भई गेम्स तो खत्म हो लिए, इस बार हमारे तीर निशाने पर लगे और गोलियां भी नहीं चूकी। इसलिए ऑस्ट्रेलिया को छोड़ बाकी सबको पटखनी देकर हम अंक तालिका में दूसरे नंबर पर पहुंच गए। अब गेम्स विलेज का क्या होगा, सुना है डीडीए उसे जल्द ही अपने कब्जे में लेकर खरीदारों को न्यौता देने वाला है। सुना है लगभग 1 करोड़ रुपए से एक फ्लैट की कीमत शुरू होती है, और जिसकी अंटी में इतना पैसा हो वह ले उड़े। जरा ठहरिए! हमारे पास एक सुझाव है इस गेम्स विलेज के इस्तेमाल को लेकर।

नेताजी! अरे भई संसद में बैठने वाले अपने सांसद महोदय, उन्हें क्यों न इन फ्लैटों में बसा दिया जाए। सांसद महोदय को वर्ल्ड क्लास सुविधा मिल जाएगी और डीडीए की फ्लैट बेचने की कवायद का झंझट भी खत्म हो जाएगी। वैसे भी हमारे सांसद महोदय सेंट्रल दिल्ली के अलिशान बंगलों में तन्हा रहकर बोर हो चुके हैं, यहां सब साथ-साथ रहेंगे, खेलेंगे, कुदेंगे और ऐश करेंगे और क्या!

इसका एक फायदा यह भी है कि अलग-अलग बंगलों में सुरक्षा देने में देश का ढ़ेर सारा पैसा जो खर्च होता है, वह भी कुछ बच जाएगा। भई देखिए, हमें तो यह आइडिया बिल्कुल ‘व्हाट एन आइडिया सरजी’ वाला आइडिया लगा। बाकी डीडीए व सांसद महोदयों की मर्जी, हमने तो अपनी तरफ से सिफारिश कर दी है। बाकी रही बात जिन बंगलों में अभी हमारे नेताजी लोग रह रहे हैं उनके इस्तेमाल की तो, उनका भी कुछ न कुछ सोच ही लिया जाएगा।

आइडिया तो गेम्स विलेज को छात्रों के लिए हॉस्टल की तरह इस्तेमाल का भी बुरा नहीं है। सुना है ऐसा ही आयोजन समिति ने भी पहले सोचा था। सुना तो यह भी है कि उन्होंने यह भी सोचा था कि इसे हॉस्टल की तरह इस्तेमाल करेंगे और आगे जब भी इस तरह का कोई आयोजन होगा तो फिर गेम्स विलेज का इस्तेमाल कर लेंगे।

बुढ़े नेता या फिर हमारे युवा छात्र बंधु, जो भी हमारे इस आइडिया को भुनाने की कोशिश करेगा, हम उसका पूरा साथ देंगे। अगर युद्ध दो तरफा हो तो मजा ही आ जाए, फिर देखेंगे कि युवा शक्ति जीतती है या नेताजी बाजी मार ले जाते हैं। हम तो ईशारा दे चुके हैं, अब यह आइडिया सही जगह तक पहुंच जाए और कहीं से एक चिंगारी जल उठे तो मजा आ जाए।

आप सोच रहे होंगे अब इतनी देर में क्‍यों तो आपको बता दूं लाइवहिन्‍दुस्‍तान के ब्‍लॉग पर उस समय लिखा था लेकिन अपने व्‍यक्तिगत ब्‍लॉग पर पोस्‍ट को टांगने का वक्‍त अब ही मिला है।

Tuesday, September 14, 2010

इंद्रदेव के नये टूरिस्ट स्पॉट का मजा लीजिए...

कॉमनवेल्‍थ गेम्स शुरू होने से ठीक पहले दिल्ली को एक और टूरिस्ट स्पॉट मिल गया। इस नए टूरिस्ट स्पॉट पर लोग अपने पूरे परिवार सहित गाड़ियों में सवार होकर आ रहे हैं। इधर से गुजरते लोगों में भी दिल्ली के इस नये-नवेले टूरिस्ट स्पॉट को देखकर खुशी और हैरत का मिश्रित भाव है। हर कोई इसे जी भर के निहार लेना चाहता है, क्या पता फिर ऐसा नजारा कब देखने को मिले! ये भी नहीं पता कि मिलेगा भी या नहीं! एक बात तो तय मानी जा रही है कि कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने से पहले ही यह टूरिस्ट स्पॉट अपनी यह सुंदरता खो देगा। अब आप कहेंगे अमा यार गज़ब के इंसान हो। सरकार कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए सुंदरता-सुंदरता चिल्ला रही है और तुम इस टूरिस्ट स्पॉट की सुंदरता तब तक खत्म होने की बात कर रहे हो। दोस्तो इस नए टूरिस्ट स्पॉट का नाम आप सब जानते हैं। लेकिन आज तक यह आपके लिए नाक-मुंह सिकोड़ने वाला भर था। जी हां यमुना नदी की ही बात कर रहा हूं। जिसके पास से गुजरते ही आप नाक बंद करके मुंह सिकोड़ते हुए निकल जाते थे और जाते-जाते इसे गंदा नाला भी कह जाते थे।

आजकल आप यमुना पर बने किसी भी पुल से गुजरिए लोग पुल के किनारे गाड़ी लगाकर इसे ऐसे देखते हैं जैसे कह रहे हों कि ‘आ तुझे आंखों में भर लूं।’ यमुना में इतना पानी है कि इसने निचले इलाकों में लोगों के घरों में भी घुसपैठ कर दी है। इस सब के बावजूद यमुना की जो सुंदरता अभी दिख रही है उसे देखते हुए लगता है कि काश! यह सुंदरता हमेशा बनी रहती। अब आपको याद होगा, सरकार पिछले कई सालों से यमुना के आसपास सौंदर्यीकरण क्यों कराना चाहती थी। लेकिन ये सरकार के बूते की बात नहीं है, ऐसा ही कुछ सोचकर इंद्रदेव ने अपने नलके खुले छोड़ दिए हैं। जितने सालों से सरकार इस इलाके की सुंदरता की बात कर रही है, अगर ऐसा कर लिया जाता तो न जाने क्या क्या हो जाता। रेहड़ी, फल, चाट, आइसक्रीम वालों से सरकार को ढ़ेर सारा राजस्व हासिल होता और किसी भ्रष्टाचारी की जेब भी गरम हो जाती। लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ, जिस यमुना को इंद्रदेव ने खूबसूरत बनाया है उसकी सुंदरता से कुछ राजस्व गरीब लोगों के पेट की आग बुझाने के काम आ रहा है जो वहां पर छोटी-छोटी चीजें बेचने के लिए आ गए हैं। अच्छा ही है गरीब का पेट भर रहा है वरना सरकार इसका सौंदर्यीकरण करती तो किसी भ्रष्टचारी की जेब भरती।

अभी आखिरी कुछ दिन बचे हैं, अगर आप अभी तक इस नए टूरिस्ट स्पॉट पर नहीं गए हैं तो तुरंत जाइए। क्या पता इंद्रदेव कब अपने नलकों पर ताला लगा दें। हो तो यह भी सकता है कि सरकार यहां पर भी एंटरटेनमेंट टैक्स लगाकर आपकी गाढ़ी कमाई और गरीब के पेट की रोटी छीनकर किसी भ्रष्टाचारी की जेब भरने लग जाए। तो जल्दी कीजिए… मिलते हैं ‘बस यूं ही’ इसी नए टूरिस्ट स्पॉट पर।

Saturday, September 11, 2010

इस एक मोहरी के सजदे धर्म व कट्टरता

ईद का मौका था, और एक बार फिर मैं अपने एक परिचित के घर पर सेवईंया खाने पहुंच गया। आपको शायद याद हो, होली के मौके पर मैंने मोहम्‍मद उमर के होली खेलने के वाकए का आपसे जिक्र किया था। उस समय जैसा ही अनुभव मोहम्‍मद उमर को होली खेलते हुए देखकर हुआ था वही मैं हर बार ईद पर सेवईंया का लुत्‍फ लेते हुए भी करता हूं। लेकिन इस बार मैं आपसे एक खास बात का जिक्र करना चाहता हूं। एक मोहरी ने मेरा ध्‍यान पिछले काफी समय से अपनी ओर खींचा हुआ था। सोचा इस बार उस मोहरी का जिक्र आप लोगों से कर ही लिया जाए। अरे सॉरी दोस्‍तो, शायद आप में से कुछ लोग मोहरी का मतलब न समझ पाए हों। असल में पहाड़ी (कुमाउंनी भाषा) में खिड़की को मोहरी कहा जाता है। एक छोटी सी मोहरी का जिक्र आपसे इस प्‍लेटफॉर्म पर क्‍यों? अगर आप भी यही सोच रहे हैं तो उसका जवाब तो ऊपर हैडिंग में ही है। क्‍योंकि इस एक मोहरी के सजदे धर्म और कट्टरता जाए। यह मोहरी हमारे समाज की उस छोटी और संकीर्ण मानसिकता को मुंह चिढ़ाती है, जो दो समुदायों में आपसी वैमन्‍स्यता फैलाती है।

इस मोहरी के एक ओर रहता है अपने धर्म को अपनी जान समझने वाला एक मुस्लिम परिवार और दूसरी ओर पूजा पाठ में रमा रहने वाला हिन्‍दू परिवार। ये एक मोहरी इन दोनों परिवारों को ठीक वैसे ही जोड़ती है जैसे आप और मैं। हर छोटी बड़ी खुशी और दुख में दोनों परिवार एक दूसरे का पूरा साथ देते हैं। इन दोनों परिवारों को एक दूसरे से बात करने के लिए घर से बाहर या एक दूसरे के घर नहीं जाना पड़ता। यह दोनों परिवार अपने कमरों में ही रहकर एक दूसरे से बड़े ही आराम से मोहरी के आर पार खड़े होकर बात करते हैं। जब भी किसी एक के घर में किसी चीज की कमी होती है तो रात-बिरात दूसरे से बात करने में कोई हिचक नहीं होती। कभी कभी तो दोनों परिवारों को देखकर लगता ही नहीं कि ये दोनों अलग अलग समुदायों से हैं। दोनों परिवार एक दूसरे के त्‍योहारों और घर के कार्यक्रमों में पूरे मन से शामिल होते हैं। इन दोनों परिवारों को देखकर लगता ही नहीं कि दोनों अलग अलग समुदायों से हैं। यह मोहरी ऐसे ही लगती है जैसे धर्म के ठेकेदार ऊंची ऊंची दीवारें चिनवाने पर आमादा हैं और ये दोनों परिवार उन दीवारों के बीच खिड़कियां निकालकर प्‍यार और सिर्फ प्‍यार की बयार बहाना चाहते हैं। इनकी इस मोहरी के मैं सजदे जाऊं और इनके बीच के इस प्‍यार और भाईचारे को किसी की नजर न लगे।

Friday, August 27, 2010

फिर चली निशाना अ-भेद कुख्यात मिसाइल

एक मिसाइल पिछले दो-तीन सालों में मशहूर हुई है। अजी मशहूर क्या, कुख्यात हुई है। ऐसे तो इसकी मारक क्षमता पर किसी को कोई संदेह नहीं है पर यह आज तक अपने लक्ष्य को न भेद पाई हो। इस मिसाइल के शिकार अमेरिका से लेकर, भारत, पाकिस्तान, चीन, इजराइल, स्वीडन और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के प्रमुख तक हो चुके हैं। इस मिसाइल की सबसे खास बात यह है कि भले ही अब तक बमुश्किल एक बार ही यह अपने लक्ष्य को भेद पाई हो, लेकिन इसने घाव बड़े गहरे होते हैं। आज तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार ही इसने अपने लक्ष्य को भेदा है और उस बार इसके शिकार हुए थे स्वीडन में इजराइल के राजदूत बेनी डेगन। पांच फरवरी, 2009 को स्टॉकहोम विश्वविद्यालय में एक समारोह के दौरान एक महिला ने डेनी पर यह मिसाइल दागी, जो सीधे जाकर उनके सीने पर लगी।

जी हां दोस्तों! आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं। यहां मैं उसी मिसाइल की बात कर रहा हूं जिसका आविष्कार एक इराकी पत्रकार मुंतजिर अल जैदी ने किया और पहली बार उस समय के दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति कहे जाने वाले जार्ज डब्ल्यू बुश पर इस मिसाइल को दागा था। इसके बाद तो यह मिसाइल इतनी कुख्यात हो गई कि दुनियाभर में इसका डंका बज गया। भारत में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी चिदंबरम, पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से लेकर कई छोटे-बड़े नेता व अन्य लोग इसके शिकार हुए।

ताजा वाकिया जम्‍मू एंव कश्‍मीर का, जहां स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर सूबे के मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला पर यह मिसाइल दागी गई। उमर राष्‍ट्रध्‍वज के सम्‍मान में खड़े थे तभी उन्‍हीं के एक मातहत पुलिसकर्मी ने उन पर यह मिसाइल दाग दी। गनीमत यह थी कि इस बार भी मिसाइल निशाने से चूक गई। इसके बाद कई तरह की बातें कही जाने लगी, पुलिसकर्मी को बर्खाश्‍त भी कर दिया गया। सबसे अलग बयान दिया उमर के पिता और पूर्व मुख्‍यमंत्री फारुख अब्‍दुल्‍लाह ने। उन्‍होंने कहा कि अब मेरा बेटा जार्ज बुश, पी चिदंबरम, मनमोहन सिंह, आसिफ अली जरदारी, वेन जियाबाओ जैसे लोगों की श्रेणी में आ गया है। पिता को गर्व हो भी क्‍यों न, यह क्‍लब है भी तो खास 'जूता खाओ क्‍लब।'

हाल ही में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी पर इस मिसाइल को दागा गया, लेकिन इस बार भी यह मिसाइल अपने लक्ष्य को नहीं भेद पाई। मिसाइल का शिकार हमारे दूसरे पड़ोसी कम्युनिस्ट मुल्क चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भी बने। दो फरवरी, 2009 को इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय में भाषण के दौरान जियाबाओ को रोकते हुए एक व्यक्ति उठा और उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए एक मिसाइल दाग दी, एक बार फिर मिसाइल निशाने से चूक गई और जियाबाओ से कुछ दूरी पर जा गिरी। मजेदार बात तो यह है कि इस मिसाइल के निर्माता मुंतजिर अल जैदी खुद भी इस मिसाइल के शिकार बन चुके हैं।

द अल-बगदादिया टेलीविजन चैनल के संवाददाता रहे जैदी के पूर्व मालिक ने बुश पर इस मिसाइल का परीक्षण करने पर उसके लिए चार बेडरूम वाला एक नया घर बनवाया और एक कार भी खरीदी। इसके अलावा पूरे अरब वर्ल्ड में जैदी ने वाहवाही बटोरी और उसके लिए उन्हें कई तोहफों से भी नवाजा गया।

इस मिसाइल ने पाकिस्तान में भी खूब गुल खिलाए। कराची के एक छात्र ने आठ अक्टूबर, 2009 को एक समारोह के दौरान अमेरिकी पत्रकार क्लिफोर्ड डी मे पर मिसाइल आजमाई। क्लिफोर्ड रिपब्लिकन हैं और जॉर्ज बुश प्रशासन के कार्यकाल के दौरान पार्टी के सक्रिय सदस्य समझे जाते थे। इस बार भी मिसाइल रास्ता भटक गई।

तुर्की के शहर इस्तानबुल में 30 सितंबर, 2009 को अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के प्रमुख डोमनिक स्त्रास काह पर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के एक छात्र ने यह मिसाइल आजमाई। मिसाइल फिर रास्ता भटक गई और डोमनिक से करीब एक मीटर की दूर जा गिरी।

भारत में एक बार ऐसे तो यह मिसाइल अपने निशाने से चूक गई, लेकिन इसकी गंभीर चोट किसी दूसरे पर असर दिखाने में कामयाबी रही। गृहमंत्री चिदंबरम पर जैसे ही यह मिसाइल दागी गई उसके कुछ दिन बाद टाइटलर को लोकसभा के लिए चुनावी टिकट गंवानी पड़ गई। अपने प्रधानमंत्री कैप्टन कूल (मनमोहन सिंह) पर भी गुजरात के अहमदाबाद में 26 अप्रैल, 2009 को एक चुनावी रैली यह मिसाइल दागी गई।

अपने पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी पर तो दूसरे दर्जे की मिसाइल दागी गई, लेकिन वह भी अपने लक्ष्य से भटक गई। आडवाणी पर 16 अप्रैल, 2009 को पार्टी के ही एक कार्यकर्ता ने चप्पल मिसाइल फेंकी जो निशाने पर नहीं लगी।

बेटे को नौकरी नहीं मिली, इसलिए एक शिक्षक ने हरियाणा में स्थानीय सांसद नवीन जिंदल पर मिसाइल दागी। इस मामले में सबसे ज्यादा स्याण पंथी दिखाई अपने मोदी भाऊ नरेन्द्र मोदी ने। उन्होंने एंटी मिसाइल प्रणाली विकसित की और महाराष्ट्र के धुले में लोकसभा प्रचार के दौरान मंच के सामने एक वॉलीबॉल नेट बंधवा दिया। मिसाइल ने कई शिकार किए हैं। भले ही वह निशाने पर एक ही बार लगी हो, लेकिन उसकी गूंज जार्ज बुश से लेकर जगदीश टाइटलर तक हर कोई महसूस करते हैं।

जय हो जूता मिसाइल, अब देखते हैं अगला निशाना कौन बनता है और इस बार मिसाइल स‍टीक निशाना लगा पाती है कि नहीं।

Monday, July 26, 2010

कितने बाप हैं तेरे

'कितने बाप हैं तेरे' अरे नहीं, ये सवाल मेरा नहीं उस ड्राइवर का था, जो हमें टाइगर फॉल दिखाने के लिए ले गया था। सवाल सुनकर मैंने सोचा अक्‍सर लोग बच्‍चों को छेड़ने के लिए ऐसा सवाल कर देते हैं, सो उसने भी बस यूं ही पूछ लिया होगा। लेकिन उस छोटे से नन्‍हें गाइड ने जवाब दिया दो बाप। मुझे कुछ अजीब सा लगा और मन में एक सवाल भी अंकुरित हो गया, इसलिए ड्राइवर से पूछ ही लिया इसका क्‍या मतलब हुआ। तो ड्राइवर ने बताया कि पहले यहां पांचाली प्रथा हुआ करती थी, अब विकास से प्रथा जाती रही। लेकिन अब भी कुछ पिछड़े इलाकों में यह प्रथा जिंदा है। (पांचाली प्रथा से उसका मतलब उस प्रथा से था जिसमें एक व्‍यक्ति एक औरत से विवाह करे तो उसके सभी भाईयों का विवाह भी उसी औरत से हो जाता था। यह प्रथा ठीक उसी तरह है, जैसे आध्‍यात्मिक महाग्रंथ महाभारत में पाचों पांडव द्रौपदी (पांचाली) के पति थे)।


खैर यह तो बात थी टाइगर फॉल से वापस लौटने पर हमारे साथ रहे छोटे से गाइड चेतन की, जिसे मैं छोटा चेतन कह कर पुकार रहा था। हिन्‍दुस्‍तान लखनऊ के एक्‍जक्‍यूटिव एडिटर श्री नवीन जोशी जी का blogs.livehindustan.com पर सुन किस्‍सा सारंगी नाम के ब्‍लॉग में कभी चकराता जाकर प्राण पाइए पढ़कर मैने मन बनया कि हनीमून के लिए चकराता ही जाना चाहिए। फिर क्‍या था हम जा पहुंचे हनीमून के लिए चकराता। आप कहीं जाएं और वहां कुछ अनजाना सा अनदेखा सा और ऐसा कुछ हो जाए जिसके लिए आप तैयार न हों तो वहां जाने का मजा दो गुना हो जाता है, भले ही शुरु‍आत में कुछ परेशानी जरूर आती है। अभी ट्रेन हरिद्वार पहुंची थी और मैंने चकराता में उन महाशय को कॉल किया जिन्‍होंने हमारे रहने की व्‍यवस्‍था करनी थी। तभी महाशय ने बताया कि रहने की व्‍यवस्‍था तो नहीं हो पाई है, मैं कुछ व्‍यवस्‍था करता हूं तब तक आप देहरादून में रुकिए और सहश्रधारा देख आइए। मैंने अपनी पत्‍नी को बताया तो वो आग बबूला हो गई, लेकिन फिर मान भी गई और हम सहश्रधारा भी देख आए। देहरादून से आधे घंटे की दूरी पर सहश्रधारा में पाकृतिक गंधक जलश्रोत बह रहा है। खैर चकराता में व्‍यवस्‍था तो नहीं हुई और हमें अपने एक पत्रकार दोस्‍त की मदद से देहरादून में ही एक होटल में ठहरना पड़ा। अगले दिन उन्‍हीं चकराता वाले भाईसाहब से बात की तो उन्‍होंने चकराता में जगह होने से तो साफ मना किया लेकिन देहरादून से लगभग 40 किमी दूर विकासनगर में ठहरने की व्‍यवस्‍था जरूर कर दी। यहां से चकराता मात्र 55 किमी रह जाता है। विकासनगर में रात बिताकर अगले दिन एक प्राइवेट टैक्‍सी करके हम चकराता के लिए निकले और सच में यहां जाकर प्राण पा लिए। इतना सुंदर, ठंडा और प्‍यारा मौसम की बस जी खुश हो गया और मन ही मन कई बार नवीन जी को धन्‍यवाद दिया। चकराता में कुछ देर रुक कर ठंडे मौसम में मैगी खाई तो ऐसे लगा जैसे इससे पहले मैगी कभी इतनी टेस्‍टी थी ही नहीं। सच में यहां मैगी का स्‍वाद ही कुछ और था, शायद ये यहां के मौसम और बांज व देवदार की जड़ों से रिस रहे पानी का कमाल था।

चकराता से करीब 17 किमी की दूरी पर है टाइगर फॉल इतना सुंदर कि यहां से आने का ही मन न करे। सड़क मार्ग से 17 किमी जाने के बाद करीब डेढ़ किमी पैदल खड़ी ढ़लान पर उतरना था। गाड़ी रुकती इससे पहले ही एक छोटा सा करीब 9 साल का लड़का गाड़ी के पास आ गया और बोला मैं आपको टाइगर फॉल दिखाऊंगा और आपका सामान भी उठाऊंगा। इसके साथ ही उसने बताया कि किसी और को अपने साथ मत चलने दीजिएगा, मैंने बैग तो उसे नहीं पकड़ाया और हम उसके पीछे-पीछे चल दिए। वह रास्‍ते भर याद दिलाता रहा कि उसे 50 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक गाइड के रूप में मिले हैं और वह स्‍कूल से आकर व छुट्टी के दिन यह काम करता है। टाइगर फॉल तो सच में वैसा ही है जैसे नवीन जी ने अपने लेख में कहा है, देखकर यहां से हटने का मन नहीं किया। हम दोनों ने यहां खूब मस्‍ती की और तन से लेकर मन तक तर होने के बाद जब ठंड तेज लगने लगी तो कपड़े बदले और धूप में आ गए। वहीं पास में एक बूढ़ा व्‍यक्ति झाड़ फूंस जलाकर चाय बना रहा था, एक चाय मैंने भी मंगवा ली। वैसे वह चाय ऐसी तो नहीं थी कि उसके बारे में कसीदे पढ़े जाएं लेकिन ठंड में अच्‍छी लग रही थी। डेढ़ किमी की चढ़ाई बैग लेकर चढ़ने की हिम्‍मत मेरी तो नहीं ही हुई, नई नवेली मेरी दुल्‍हन तो पहली बार पहाड़ गई थी। इसलिए बैग की जिम्‍मेदारी छोटा चेतन ने संभाल ली। सड़क पर पहुंचकर मैंने उसे 100 रुपए दिए लेकिन वह गाड़ी के पास ही खड़ा रहा, तभी ड्राइवर ने उससे पूछा कितने बाप हैं तेरे और उसने जवाब दिया दो। खैर चेतन से विदा लेकर हम वहां से चल दिए और डेढ़ महीने बाद भी छोटा चेतन याद आता है और टाइगर फॉल की याद फिर से तन मन को तरोताजा कर देती है।

एक प्‍यारा बहाना - बस यूं ही कुछ भी लिख दिया

बस यूं ही कुछ दिनों तक आपसे दूर हो गया था इसलिए 'बस यूं ही' पर आपसे मुलाकात नहीं हो पा रही थी। शादी और फिर हनीमून के बाद मैं एक बार फिर से आपसे मुखातिब हूं। वैसे हनीमून से आए हुए एक माह से ज्‍यादा का वक्‍त बीत चुका है, लेकिन ऑफिस से घर पहुंचकर कंप्‍यूटर के सामने बैठने का मन ही नहीं करता और ऑफिस में अपना ब्‍लॉग लिखना लगभग नामुमकिन है। खैर बहानेबाजी बहुत हो गई, लो जी आ गया हूं फिर से झेलो मुझे...................

Saturday, May 1, 2010

तनखा बढ़ा दो मेरी होता नहीं है गुजारा, थोड़ा लगा दो सहारा

तनखा बढ़ा दो मेरी,
होता नहीं है गुजारा
थोड़ा लगा दो सहारा।

ये मेरी अपने नियोक्‍ताओं से दरख्‍वास्‍त भी है और उनके सामने अपनी मजबूरी भी रो रहा हूं कि भई जो कुछ चिल्‍लड़ आप मुझे देते हो उससे अब गुजारा नहीं होता है। अप्रैल का महीना खत्‍म हो चुका है और इस गुजरे महीने में लगभग हर कोई इन लाइनों को गुनगुना रहा था। भई हम तो अब भी गुनगुना रहे हैं क्‍योंकि हमारी तनख्‍वाह तो अभी तक बढ़ी नहीं है। अब तो हमने ठान ली है कि जब तक बॉस हमारी डावांडोल होती अर्थव्‍यवस्‍था को सहारा नहीं लगाते तब तक उनके सामने इस गाने को न सिर्फ गुनगुनाएंगे बल्कि अपनी मोबाइल की रिंगटोन भी इसी गाने को बनाकर रखेंगे। ताकि जैसे ही कोई फोन आए तो बॉस को हमारी दरख्‍वास्‍त सुनाई पड़ जाए। अब तो सोच रहा हूं कि एक बार फोन आने पर न उठाऊं ताकि बॉस अच्‍छी तरह से हमारी परेशानी को समझ लें। वैसे रिंगटोन की बात निकली है तो उस पर बात आगे बढ़ाई जा सकती है। आजकल जिस तरह की रिंगटोन सुनने को मिल रही हैं उससे बहुत कुछ समझ में आता है। रिंगटोन ही नहीं कॉलर ट्यून भी बड़ी ही मजेदार सुनने को मिलती हैं आजकल। तो चलिए लगाते हैं रिंगटोन की दुनिया में गोता।

'तनखा बढ़ा दो मेरी' एक रिंगटोन तो आप सुन ही चुके हैं, ये तो खास बॉस के लिए बनाई गई है। इसी से मिलता जुलती एक और रिंगटोन जो आपको अनायास ही सुनने को मिल सकती है। रिंगटोन है - 'कसम खुदा की पैसा बहुत है, मगर मुझे प्‍यार चाहिए। ना बाई ना बाई, मुझे प्‍यार व्‍यार कुछ नहीं चाहिए मुझे सिर्फ पैसा चाहिए ऑनली पैसा ऑनली पैसा हा हा हा'। भई पैसे की महिमा है कोई उल्‍लू ही होगा जो प्‍यार की बात करेगा। प्‍यार न तो 48 रुपए किलो चीनी खरीद कर देगा और न ही 80 रुपए किलो तुअर की दाल, लेकिन पैसा ये सब दे देगा। भई हम जिस दौर में आज जी रहे हैं उसमें तो पैसा प्‍यार भी खरीद लेता है। न विश्‍वास हो तो देख लीजिए किसी अमीर बाप के बिगड़ैल, बेडौल और भद्दे से लड़के के पीछे कैसे लड़कियां या अमीर बाप की बेडौल और सारी खामियों से लैस लड़की पर भी लड़के फिदा रहते हैं। पैसा नहीं हो तो आपकी गर्ल फ्रैंड आपको छोड़ चली जाती है।

तो भईया एक बात गांठ बांध लो, ना बाप बड़ा न भईया, द होल थिंग इज दैट के भईया सबसे बड़ा रुपईया। अगर यही बात किसी के फोन की रिंगटोन के रूप में भी बजे तो हैरत में मत पड़ि‍एगा।

अगर अचानक आपको लगे कि किसी ने आपके पास में ही पानी का पूरा जग उड़ेल दिया है तो एक बार ध्‍यान से अपने आसपास के लोगों को देख लीजिए, हो सकता है किसी के मोबाइल पर ऐसी रिंगटोन लगी हो। वैसे कई बार मोबाइल की रिंगटोन आपको सपनों के दर्शन करा देती है। बाहर भीषण गर्मी है और आप तिलमिलाती गर्मी से बेहाल, अभी अचानक कोयल की आवाज सुनाई दे तो ये न समझ लेना कि आया सावन झूम के। बल्कि यह भी किसी के मोबाइल की रिंगटोन होगी, यह पहले मन में लाना भले ही सावन का महीना ही क्‍यों न हो। अकेली सुनसान सड़क पर चल रहे हैं और अचानक कोई इंसान आपके पास से होकर गुजरे तभी बच्‍चे के हंसने की आवाज आए, लेकिन बच्‍चा न दिखे तो भूत समझकर उल्‍टे पांव दौड़ने की बजाए एक बार ये सोच लीजिएगा कि ये भी मोबाइल की रिंगटोन हो सकती है। कभी सुनसान अंधेरी रात में अचानक बिल्‍ली की आवाज सुनाई दे तो कोई घोर अंधविश्‍वासी इसे कोई आत्‍मा समझ बैठे तो हैरत की बात नहीं, लेकिन आप ऐसा न समझें क्‍योंकि ऐसी रिंगटोन भी आजकल सुनने को मिल जाती हैं। एक और रिंगटोन जो मेरे समझ में नहीं आई लेकिन हो सकता है आप समझ जाएं, अगर ऐसा हो तो मुझे भी बताइएगा। यह रिंगटोन कुछ इस तरह है न्‍य न्‍य न्‍यो न्‍यो, अय्यो अय्यो आगे समझ में नहीं आया। अचानक से आपको चलते फिरते टीवी वाली छोटी सी बहु आनंदी की धुन 'छोटी सी उमर' भी किसी के मोबाइल पर बजते सुनाई दे सकती है।

क्‍या आपको याद है एक समय विवेक ओबराय और रानी मुखर्जी की हिट फिल्‍म साथिया की ट्यून, खासी हिट हुआ करती थी, उस समय आज की तरह गाना नहीं बल्कि सिर्फ ट्यून ही सुनाई पड़ती थी। इस बात का यहां कोई औचित्‍य तो नहीं है मैंने सोचा एक बार 2जी का वह जमाना याद कर लिया जाए जब ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फोन भी अगर किसी के पास होता था तो उसका स्‍टेटस आपसे ऊपर होता था और एक वक्‍त आज है जब 8 सौ रुपए में रंगीन मोबाइल धक्‍के खा रहे हैं। अपनी बात बताऊं तो मैंने सबसे पहले 3000 रुपए खर्च करके सैकेंड हैंड नोकिया-3315 मोबाइल खरीदा। जिसे बाद में 8 महीने चलाकर एक बार फिर 2200 रुपए में बेच दिया था। मैंने भी साथिया फिल्‍म की उस रिंगटोन को अपने मोबाइल में काफी समय तक बजाया या यूं कहूं बजवाया था।

रिंगटोन और भी हैं जैसे बच्‍चे की हंसने की ट्यून रैप करके भी सुनाई पड़ जाती है। लेटेस्‍ट हिन्‍दी फिल्‍म का गाना, किसी के पसंदीदा सीरियल का टाइटल सॉन्‍ग या गब्‍बर की आवाज भी रिंगटोन में सुनने को मिलती है। तो भईया तैयार रहिए हो सकता है आपको भी ऐसी ही किसी रिंगटोन से सामना हो जाए।