Friday, August 27, 2010

फिर चली निशाना अ-भेद कुख्यात मिसाइल

एक मिसाइल पिछले दो-तीन सालों में मशहूर हुई है। अजी मशहूर क्या, कुख्यात हुई है। ऐसे तो इसकी मारक क्षमता पर किसी को कोई संदेह नहीं है पर यह आज तक अपने लक्ष्य को न भेद पाई हो। इस मिसाइल के शिकार अमेरिका से लेकर, भारत, पाकिस्तान, चीन, इजराइल, स्वीडन और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के प्रमुख तक हो चुके हैं। इस मिसाइल की सबसे खास बात यह है कि भले ही अब तक बमुश्किल एक बार ही यह अपने लक्ष्य को भेद पाई हो, लेकिन इसने घाव बड़े गहरे होते हैं। आज तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार ही इसने अपने लक्ष्य को भेदा है और उस बार इसके शिकार हुए थे स्वीडन में इजराइल के राजदूत बेनी डेगन। पांच फरवरी, 2009 को स्टॉकहोम विश्वविद्यालय में एक समारोह के दौरान एक महिला ने डेनी पर यह मिसाइल दागी, जो सीधे जाकर उनके सीने पर लगी।

जी हां दोस्तों! आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं। यहां मैं उसी मिसाइल की बात कर रहा हूं जिसका आविष्कार एक इराकी पत्रकार मुंतजिर अल जैदी ने किया और पहली बार उस समय के दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति कहे जाने वाले जार्ज डब्ल्यू बुश पर इस मिसाइल को दागा था। इसके बाद तो यह मिसाइल इतनी कुख्यात हो गई कि दुनियाभर में इसका डंका बज गया। भारत में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी चिदंबरम, पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से लेकर कई छोटे-बड़े नेता व अन्य लोग इसके शिकार हुए।

ताजा वाकिया जम्‍मू एंव कश्‍मीर का, जहां स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर सूबे के मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला पर यह मिसाइल दागी गई। उमर राष्‍ट्रध्‍वज के सम्‍मान में खड़े थे तभी उन्‍हीं के एक मातहत पुलिसकर्मी ने उन पर यह मिसाइल दाग दी। गनीमत यह थी कि इस बार भी मिसाइल निशाने से चूक गई। इसके बाद कई तरह की बातें कही जाने लगी, पुलिसकर्मी को बर्खाश्‍त भी कर दिया गया। सबसे अलग बयान दिया उमर के पिता और पूर्व मुख्‍यमंत्री फारुख अब्‍दुल्‍लाह ने। उन्‍होंने कहा कि अब मेरा बेटा जार्ज बुश, पी चिदंबरम, मनमोहन सिंह, आसिफ अली जरदारी, वेन जियाबाओ जैसे लोगों की श्रेणी में आ गया है। पिता को गर्व हो भी क्‍यों न, यह क्‍लब है भी तो खास 'जूता खाओ क्‍लब।'

हाल ही में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी पर इस मिसाइल को दागा गया, लेकिन इस बार भी यह मिसाइल अपने लक्ष्य को नहीं भेद पाई। मिसाइल का शिकार हमारे दूसरे पड़ोसी कम्युनिस्ट मुल्क चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भी बने। दो फरवरी, 2009 को इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय में भाषण के दौरान जियाबाओ को रोकते हुए एक व्यक्ति उठा और उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए एक मिसाइल दाग दी, एक बार फिर मिसाइल निशाने से चूक गई और जियाबाओ से कुछ दूरी पर जा गिरी। मजेदार बात तो यह है कि इस मिसाइल के निर्माता मुंतजिर अल जैदी खुद भी इस मिसाइल के शिकार बन चुके हैं।

द अल-बगदादिया टेलीविजन चैनल के संवाददाता रहे जैदी के पूर्व मालिक ने बुश पर इस मिसाइल का परीक्षण करने पर उसके लिए चार बेडरूम वाला एक नया घर बनवाया और एक कार भी खरीदी। इसके अलावा पूरे अरब वर्ल्ड में जैदी ने वाहवाही बटोरी और उसके लिए उन्हें कई तोहफों से भी नवाजा गया।

इस मिसाइल ने पाकिस्तान में भी खूब गुल खिलाए। कराची के एक छात्र ने आठ अक्टूबर, 2009 को एक समारोह के दौरान अमेरिकी पत्रकार क्लिफोर्ड डी मे पर मिसाइल आजमाई। क्लिफोर्ड रिपब्लिकन हैं और जॉर्ज बुश प्रशासन के कार्यकाल के दौरान पार्टी के सक्रिय सदस्य समझे जाते थे। इस बार भी मिसाइल रास्ता भटक गई।

तुर्की के शहर इस्तानबुल में 30 सितंबर, 2009 को अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के प्रमुख डोमनिक स्त्रास काह पर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के एक छात्र ने यह मिसाइल आजमाई। मिसाइल फिर रास्ता भटक गई और डोमनिक से करीब एक मीटर की दूर जा गिरी।

भारत में एक बार ऐसे तो यह मिसाइल अपने निशाने से चूक गई, लेकिन इसकी गंभीर चोट किसी दूसरे पर असर दिखाने में कामयाबी रही। गृहमंत्री चिदंबरम पर जैसे ही यह मिसाइल दागी गई उसके कुछ दिन बाद टाइटलर को लोकसभा के लिए चुनावी टिकट गंवानी पड़ गई। अपने प्रधानमंत्री कैप्टन कूल (मनमोहन सिंह) पर भी गुजरात के अहमदाबाद में 26 अप्रैल, 2009 को एक चुनावी रैली यह मिसाइल दागी गई।

अपने पूर्व गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी पर तो दूसरे दर्जे की मिसाइल दागी गई, लेकिन वह भी अपने लक्ष्य से भटक गई। आडवाणी पर 16 अप्रैल, 2009 को पार्टी के ही एक कार्यकर्ता ने चप्पल मिसाइल फेंकी जो निशाने पर नहीं लगी।

बेटे को नौकरी नहीं मिली, इसलिए एक शिक्षक ने हरियाणा में स्थानीय सांसद नवीन जिंदल पर मिसाइल दागी। इस मामले में सबसे ज्यादा स्याण पंथी दिखाई अपने मोदी भाऊ नरेन्द्र मोदी ने। उन्होंने एंटी मिसाइल प्रणाली विकसित की और महाराष्ट्र के धुले में लोकसभा प्रचार के दौरान मंच के सामने एक वॉलीबॉल नेट बंधवा दिया। मिसाइल ने कई शिकार किए हैं। भले ही वह निशाने पर एक ही बार लगी हो, लेकिन उसकी गूंज जार्ज बुश से लेकर जगदीश टाइटलर तक हर कोई महसूस करते हैं।

जय हो जूता मिसाइल, अब देखते हैं अगला निशाना कौन बनता है और इस बार मिसाइल स‍टीक निशाना लगा पाती है कि नहीं।

Monday, July 26, 2010

कितने बाप हैं तेरे

'कितने बाप हैं तेरे' अरे नहीं, ये सवाल मेरा नहीं उस ड्राइवर का था, जो हमें टाइगर फॉल दिखाने के लिए ले गया था। सवाल सुनकर मैंने सोचा अक्‍सर लोग बच्‍चों को छेड़ने के लिए ऐसा सवाल कर देते हैं, सो उसने भी बस यूं ही पूछ लिया होगा। लेकिन उस छोटे से नन्‍हें गाइड ने जवाब दिया दो बाप। मुझे कुछ अजीब सा लगा और मन में एक सवाल भी अंकुरित हो गया, इसलिए ड्राइवर से पूछ ही लिया इसका क्‍या मतलब हुआ। तो ड्राइवर ने बताया कि पहले यहां पांचाली प्रथा हुआ करती थी, अब विकास से प्रथा जाती रही। लेकिन अब भी कुछ पिछड़े इलाकों में यह प्रथा जिंदा है। (पांचाली प्रथा से उसका मतलब उस प्रथा से था जिसमें एक व्‍यक्ति एक औरत से विवाह करे तो उसके सभी भाईयों का विवाह भी उसी औरत से हो जाता था। यह प्रथा ठीक उसी तरह है, जैसे आध्‍यात्मिक महाग्रंथ महाभारत में पाचों पांडव द्रौपदी (पांचाली) के पति थे)।


खैर यह तो बात थी टाइगर फॉल से वापस लौटने पर हमारे साथ रहे छोटे से गाइड चेतन की, जिसे मैं छोटा चेतन कह कर पुकार रहा था। हिन्‍दुस्‍तान लखनऊ के एक्‍जक्‍यूटिव एडिटर श्री नवीन जोशी जी का blogs.livehindustan.com पर सुन किस्‍सा सारंगी नाम के ब्‍लॉग में कभी चकराता जाकर प्राण पाइए पढ़कर मैने मन बनया कि हनीमून के लिए चकराता ही जाना चाहिए। फिर क्‍या था हम जा पहुंचे हनीमून के लिए चकराता। आप कहीं जाएं और वहां कुछ अनजाना सा अनदेखा सा और ऐसा कुछ हो जाए जिसके लिए आप तैयार न हों तो वहां जाने का मजा दो गुना हो जाता है, भले ही शुरु‍आत में कुछ परेशानी जरूर आती है। अभी ट्रेन हरिद्वार पहुंची थी और मैंने चकराता में उन महाशय को कॉल किया जिन्‍होंने हमारे रहने की व्‍यवस्‍था करनी थी। तभी महाशय ने बताया कि रहने की व्‍यवस्‍था तो नहीं हो पाई है, मैं कुछ व्‍यवस्‍था करता हूं तब तक आप देहरादून में रुकिए और सहश्रधारा देख आइए। मैंने अपनी पत्‍नी को बताया तो वो आग बबूला हो गई, लेकिन फिर मान भी गई और हम सहश्रधारा भी देख आए। देहरादून से आधे घंटे की दूरी पर सहश्रधारा में पाकृतिक गंधक जलश्रोत बह रहा है। खैर चकराता में व्‍यवस्‍था तो नहीं हुई और हमें अपने एक पत्रकार दोस्‍त की मदद से देहरादून में ही एक होटल में ठहरना पड़ा। अगले दिन उन्‍हीं चकराता वाले भाईसाहब से बात की तो उन्‍होंने चकराता में जगह होने से तो साफ मना किया लेकिन देहरादून से लगभग 40 किमी दूर विकासनगर में ठहरने की व्‍यवस्‍था जरूर कर दी। यहां से चकराता मात्र 55 किमी रह जाता है। विकासनगर में रात बिताकर अगले दिन एक प्राइवेट टैक्‍सी करके हम चकराता के लिए निकले और सच में यहां जाकर प्राण पा लिए। इतना सुंदर, ठंडा और प्‍यारा मौसम की बस जी खुश हो गया और मन ही मन कई बार नवीन जी को धन्‍यवाद दिया। चकराता में कुछ देर रुक कर ठंडे मौसम में मैगी खाई तो ऐसे लगा जैसे इससे पहले मैगी कभी इतनी टेस्‍टी थी ही नहीं। सच में यहां मैगी का स्‍वाद ही कुछ और था, शायद ये यहां के मौसम और बांज व देवदार की जड़ों से रिस रहे पानी का कमाल था।

चकराता से करीब 17 किमी की दूरी पर है टाइगर फॉल इतना सुंदर कि यहां से आने का ही मन न करे। सड़क मार्ग से 17 किमी जाने के बाद करीब डेढ़ किमी पैदल खड़ी ढ़लान पर उतरना था। गाड़ी रुकती इससे पहले ही एक छोटा सा करीब 9 साल का लड़का गाड़ी के पास आ गया और बोला मैं आपको टाइगर फॉल दिखाऊंगा और आपका सामान भी उठाऊंगा। इसके साथ ही उसने बताया कि किसी और को अपने साथ मत चलने दीजिएगा, मैंने बैग तो उसे नहीं पकड़ाया और हम उसके पीछे-पीछे चल दिए। वह रास्‍ते भर याद दिलाता रहा कि उसे 50 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक गाइड के रूप में मिले हैं और वह स्‍कूल से आकर व छुट्टी के दिन यह काम करता है। टाइगर फॉल तो सच में वैसा ही है जैसे नवीन जी ने अपने लेख में कहा है, देखकर यहां से हटने का मन नहीं किया। हम दोनों ने यहां खूब मस्‍ती की और तन से लेकर मन तक तर होने के बाद जब ठंड तेज लगने लगी तो कपड़े बदले और धूप में आ गए। वहीं पास में एक बूढ़ा व्‍यक्ति झाड़ फूंस जलाकर चाय बना रहा था, एक चाय मैंने भी मंगवा ली। वैसे वह चाय ऐसी तो नहीं थी कि उसके बारे में कसीदे पढ़े जाएं लेकिन ठंड में अच्‍छी लग रही थी। डेढ़ किमी की चढ़ाई बैग लेकर चढ़ने की हिम्‍मत मेरी तो नहीं ही हुई, नई नवेली मेरी दुल्‍हन तो पहली बार पहाड़ गई थी। इसलिए बैग की जिम्‍मेदारी छोटा चेतन ने संभाल ली। सड़क पर पहुंचकर मैंने उसे 100 रुपए दिए लेकिन वह गाड़ी के पास ही खड़ा रहा, तभी ड्राइवर ने उससे पूछा कितने बाप हैं तेरे और उसने जवाब दिया दो। खैर चेतन से विदा लेकर हम वहां से चल दिए और डेढ़ महीने बाद भी छोटा चेतन याद आता है और टाइगर फॉल की याद फिर से तन मन को तरोताजा कर देती है।

एक प्‍यारा बहाना - बस यूं ही कुछ भी लिख दिया

बस यूं ही कुछ दिनों तक आपसे दूर हो गया था इसलिए 'बस यूं ही' पर आपसे मुलाकात नहीं हो पा रही थी। शादी और फिर हनीमून के बाद मैं एक बार फिर से आपसे मुखातिब हूं। वैसे हनीमून से आए हुए एक माह से ज्‍यादा का वक्‍त बीत चुका है, लेकिन ऑफिस से घर पहुंचकर कंप्‍यूटर के सामने बैठने का मन ही नहीं करता और ऑफिस में अपना ब्‍लॉग लिखना लगभग नामुमकिन है। खैर बहानेबाजी बहुत हो गई, लो जी आ गया हूं फिर से झेलो मुझे...................

Saturday, May 1, 2010

तनखा बढ़ा दो मेरी होता नहीं है गुजारा, थोड़ा लगा दो सहारा

तनखा बढ़ा दो मेरी,
होता नहीं है गुजारा
थोड़ा लगा दो सहारा।

ये मेरी अपने नियोक्‍ताओं से दरख्‍वास्‍त भी है और उनके सामने अपनी मजबूरी भी रो रहा हूं कि भई जो कुछ चिल्‍लड़ आप मुझे देते हो उससे अब गुजारा नहीं होता है। अप्रैल का महीना खत्‍म हो चुका है और इस गुजरे महीने में लगभग हर कोई इन लाइनों को गुनगुना रहा था। भई हम तो अब भी गुनगुना रहे हैं क्‍योंकि हमारी तनख्‍वाह तो अभी तक बढ़ी नहीं है। अब तो हमने ठान ली है कि जब तक बॉस हमारी डावांडोल होती अर्थव्‍यवस्‍था को सहारा नहीं लगाते तब तक उनके सामने इस गाने को न सिर्फ गुनगुनाएंगे बल्कि अपनी मोबाइल की रिंगटोन भी इसी गाने को बनाकर रखेंगे। ताकि जैसे ही कोई फोन आए तो बॉस को हमारी दरख्‍वास्‍त सुनाई पड़ जाए। अब तो सोच रहा हूं कि एक बार फोन आने पर न उठाऊं ताकि बॉस अच्‍छी तरह से हमारी परेशानी को समझ लें। वैसे रिंगटोन की बात निकली है तो उस पर बात आगे बढ़ाई जा सकती है। आजकल जिस तरह की रिंगटोन सुनने को मिल रही हैं उससे बहुत कुछ समझ में आता है। रिंगटोन ही नहीं कॉलर ट्यून भी बड़ी ही मजेदार सुनने को मिलती हैं आजकल। तो चलिए लगाते हैं रिंगटोन की दुनिया में गोता।

'तनखा बढ़ा दो मेरी' एक रिंगटोन तो आप सुन ही चुके हैं, ये तो खास बॉस के लिए बनाई गई है। इसी से मिलता जुलती एक और रिंगटोन जो आपको अनायास ही सुनने को मिल सकती है। रिंगटोन है - 'कसम खुदा की पैसा बहुत है, मगर मुझे प्‍यार चाहिए। ना बाई ना बाई, मुझे प्‍यार व्‍यार कुछ नहीं चाहिए मुझे सिर्फ पैसा चाहिए ऑनली पैसा ऑनली पैसा हा हा हा'। भई पैसे की महिमा है कोई उल्‍लू ही होगा जो प्‍यार की बात करेगा। प्‍यार न तो 48 रुपए किलो चीनी खरीद कर देगा और न ही 80 रुपए किलो तुअर की दाल, लेकिन पैसा ये सब दे देगा। भई हम जिस दौर में आज जी रहे हैं उसमें तो पैसा प्‍यार भी खरीद लेता है। न विश्‍वास हो तो देख लीजिए किसी अमीर बाप के बिगड़ैल, बेडौल और भद्दे से लड़के के पीछे कैसे लड़कियां या अमीर बाप की बेडौल और सारी खामियों से लैस लड़की पर भी लड़के फिदा रहते हैं। पैसा नहीं हो तो आपकी गर्ल फ्रैंड आपको छोड़ चली जाती है।

तो भईया एक बात गांठ बांध लो, ना बाप बड़ा न भईया, द होल थिंग इज दैट के भईया सबसे बड़ा रुपईया। अगर यही बात किसी के फोन की रिंगटोन के रूप में भी बजे तो हैरत में मत पड़ि‍एगा।

अगर अचानक आपको लगे कि किसी ने आपके पास में ही पानी का पूरा जग उड़ेल दिया है तो एक बार ध्‍यान से अपने आसपास के लोगों को देख लीजिए, हो सकता है किसी के मोबाइल पर ऐसी रिंगटोन लगी हो। वैसे कई बार मोबाइल की रिंगटोन आपको सपनों के दर्शन करा देती है। बाहर भीषण गर्मी है और आप तिलमिलाती गर्मी से बेहाल, अभी अचानक कोयल की आवाज सुनाई दे तो ये न समझ लेना कि आया सावन झूम के। बल्कि यह भी किसी के मोबाइल की रिंगटोन होगी, यह पहले मन में लाना भले ही सावन का महीना ही क्‍यों न हो। अकेली सुनसान सड़क पर चल रहे हैं और अचानक कोई इंसान आपके पास से होकर गुजरे तभी बच्‍चे के हंसने की आवाज आए, लेकिन बच्‍चा न दिखे तो भूत समझकर उल्‍टे पांव दौड़ने की बजाए एक बार ये सोच लीजिएगा कि ये भी मोबाइल की रिंगटोन हो सकती है। कभी सुनसान अंधेरी रात में अचानक बिल्‍ली की आवाज सुनाई दे तो कोई घोर अंधविश्‍वासी इसे कोई आत्‍मा समझ बैठे तो हैरत की बात नहीं, लेकिन आप ऐसा न समझें क्‍योंकि ऐसी रिंगटोन भी आजकल सुनने को मिल जाती हैं। एक और रिंगटोन जो मेरे समझ में नहीं आई लेकिन हो सकता है आप समझ जाएं, अगर ऐसा हो तो मुझे भी बताइएगा। यह रिंगटोन कुछ इस तरह है न्‍य न्‍य न्‍यो न्‍यो, अय्यो अय्यो आगे समझ में नहीं आया। अचानक से आपको चलते फिरते टीवी वाली छोटी सी बहु आनंदी की धुन 'छोटी सी उमर' भी किसी के मोबाइल पर बजते सुनाई दे सकती है।

क्‍या आपको याद है एक समय विवेक ओबराय और रानी मुखर्जी की हिट फिल्‍म साथिया की ट्यून, खासी हिट हुआ करती थी, उस समय आज की तरह गाना नहीं बल्कि सिर्फ ट्यून ही सुनाई पड़ती थी। इस बात का यहां कोई औचित्‍य तो नहीं है मैंने सोचा एक बार 2जी का वह जमाना याद कर लिया जाए जब ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फोन भी अगर किसी के पास होता था तो उसका स्‍टेटस आपसे ऊपर होता था और एक वक्‍त आज है जब 8 सौ रुपए में रंगीन मोबाइल धक्‍के खा रहे हैं। अपनी बात बताऊं तो मैंने सबसे पहले 3000 रुपए खर्च करके सैकेंड हैंड नोकिया-3315 मोबाइल खरीदा। जिसे बाद में 8 महीने चलाकर एक बार फिर 2200 रुपए में बेच दिया था। मैंने भी साथिया फिल्‍म की उस रिंगटोन को अपने मोबाइल में काफी समय तक बजाया या यूं कहूं बजवाया था।

रिंगटोन और भी हैं जैसे बच्‍चे की हंसने की ट्यून रैप करके भी सुनाई पड़ जाती है। लेटेस्‍ट हिन्‍दी फिल्‍म का गाना, किसी के पसंदीदा सीरियल का टाइटल सॉन्‍ग या गब्‍बर की आवाज भी रिंगटोन में सुनने को मिलती है। तो भईया तैयार रहिए हो सकता है आपको भी ऐसी ही किसी रिंगटोन से सामना हो जाए।

Wednesday, April 21, 2010

थरूर, राठौर से पूछ लो, हंसी बहुत महंगी है

जी हां हंसी आजकल के दौर में बहुत महंगी हो चुकी है। इंसान अपनी रोजमर्रा की जिन्‍दगी में इतना व्‍यस्‍त हो गया है कि उसके पास हंसने का समय ही नहीं है। ऐसे में अगर वह हंसने के लिए वक्‍त निकाले तो हो सकता है एक वक्‍त का खाना कम पड़ जाए, क्‍योंकि हंसी के वक्‍त की ऐवज में तो वह काम से लदा हुआ है। ताकि अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। इससे भी बड़ी बात यह कि मुश्किल की घड़ी में हंसना तो विरले ही जानते हैं। लेकिन कुछ लोग हैं जो मुश्किल की घड़ी में भी हंसने की हिम्‍मत दिखाते हैं, लेकिन हंसी इन्‍हें भी महंगी ही पड़ती है! भई मैंने तो कुछ ऐसा ही देखा है, अगर आपने हंसी का किसी पर अच्‍छा असर देखा हो तो ये आपकी किस्‍मत।

शशि थरूर आईपीएल की दलदल में ऐसे फंसे कि आखिर उन्‍हें इस्‍तीफा देना पड़ा। लेकिन क्‍या आपको इससे पहले का पूरा वाकिया याद है? नहीं! तो कोई बात नहीं, मैं बता देता हूं। आईपीएल में चौथे साल से दो और टीमें कोच्चि और पुणे की टीमें भी जुड़ जाएंगी। इस साल इन दोनों की टीमों की निलामी हुई और कोच्चि की टीम से हमारे ट्विटर मंत्री के हित जुड़े होने की बात सामने आई। आईपीएल कमीश्‍नर ललित मोदी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर शशि थरूर के बारे में ये बातें कहीं, साथ ही उनकी दोस्‍त सुनंदा पुष्‍कर के साथ ही उनके रिश्‍तों पर भी बात कही गई। विपक्ष के इस्‍तीफा देने के दबाव के बीच शशि थरूर को संसद में अपना पक्ष रखने को कहा गया। उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए अपनी बातें कहनी शुरू की लेकिन विपक्ष ने उनकी एक न चलने दी और आखिर उन्‍होंने लिखित में अपना बयान टेबल पर रख दिया। उनके लिए वह हंसी या मुस्‍कुराहट महंगी पड़ी और आखिर उन्‍हें इस्‍तीफा देना पड़ा।

राठौर तो याद है आपको, वही रुचिका के साथ छेड़छाड और उसके बाद उसे आत्‍महत्‍या के लिए उकसाने का दोषी हरियाणा का पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर। एक बार कोर्ट ने उसको राहत क्‍या दी, वह कोर्ट से बाहर मुस्‍कुराते हुए ऐसे निकला जैसे कोई जंग जीत ली हो। बस फिर क्‍या था, हमारा मीडिया आजकल कुछ ज्‍यादा ही सजग है और उसने मानो राठौर की हंसी पर ग्रहण लगा दिया। हंसी पर सवाल उठे तो राठौर साहब कभी पंडित नेहरू से प्रेरणा लेने की बात करने लगे तो कभी अपनी शक्‍ल को ही हंसी का गुनहगार बताने लगे। वैसे अब 'लाफिंग बुढ़ा' राठौर को समझ में आ गया होगा कि एक हंसी कितनी महंगी पड़ सकती है।

इंटरनेशनल क्‍वालिटी का ट्विटर मंत्री
एक बार फिर अपने ट्विटर मंत्री की बात करते हैं। वैसे मैं सच बताऊं तो मुझे उनका संसद में मुस्‍कुराते हुए विपक्ष के शब्‍द बाणों का सामना करने का अंदाज बेहद भाया। भई ये तो अपने अपने आराम का मामला है। वैसे ट्विटर के रास्‍ते उनकी विदेश राज्‍य मंत्री की कुर्सी से विदाई से पहले भी मंत्री जी कई बार अपने इंटरनेशनल क्‍वालिटी के नेता होने को साबित कर चुके हैं। सबसे पहले तो मंत्री पद संभालने के बाद पांचसितारा होटल में ठहरने को लेकर खूब बवाल हुआ। इसके बाद इकोनॉमी क्‍लास को 'कैटल क्‍लास' (हिन्‍दी में शब्‍दश: अर्थ जानवरों की श्रेणी और अंग्रेजी में गरीबों के लिए इस्‍तेमाल होने वाला एक आम शब्‍द) कहने के बाद भी खूब बवाल हुआ। संसद में जिस तरह से वे मुस्‍कुराते हुए विपक्ष के हृदय छेदी (भेदी) बाणों का सामना कर रहे थे उससे यह तो समझ में आता ही है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र (यूएन) में बाल झटकते हुए बोलने वाले हमारे पूर्व ट्विटर मंत्री हमारे सांसदों को भी मन ही मन कैटल क्‍लास कह कर हंस रहे हों। लेकिन हमारे कैटल क्‍लास मंत्रियों को न तो उनका बाल झटकना पसंद आया और न ही हंसना। तो भई मोरल ऑफ द स्‍टोरी ये है कि हंसी महंगी हो गई है, और आपने फिर भी हंसने को कोशिश की तो महंगी पड़ जाएगी। हंसी में थोड़ी 'चीन कम' चलेगी, इसमें हर्ज भी क्‍या है। कुछ समय पहले की ही तो बात है हमारे कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा भी था कि भई ज्‍यादा चीनी खाने से डायबटीज हो जाती है। हंसी के मामले में भी कुछ ऐसा ही है, इसलिए थोड़ा थोड़ा भी नहीं अकेले में अच्‍छी तरह से देख लेने के बाद की कहीं कोई छुपा कैमरा तो नहीं देख रहा, इसकी तसल्‍ली होने के बाद ही हंसा करो।

Monday, April 5, 2010

दुनिया की आखिरी लड़की का स्‍वयंवर - सानिया के बहाने


सोहराब मिर्जा से सानिया की शादी टूटी तो हमने भी तैश में आकर 'दीवानों की मौजां ही मौजां' नाम से एक ब्‍लॉग लिख डाला था। लेकिन पिछले कुछ दिनों से जैसे सानिया सुर्खियों में छाई हुई है, भई उसने तो मुझे व्‍यक्तिगत तौर पर बड़ा हैरान किया है। पहली बात तो मैं सभी दीवानों को यह बता देना चाहता हूं कि भई सानिया की निजी जिन्‍दगी भी है और अपनी जिन्‍दगी का फैसला लेने का उसे पूरा हक है। फिर चाहे वह शोएब मलिक से शादी करे या सोमालियाई डाकूओं से, उससे हमारी जिन्‍दगी पर भला क्‍या असर पड़ सकता है।

असली मुद्दे पर आऊं तो मैं एक बार फिर अपनी हैडिंग की तरफ आ रहा हूं। जिस तरह से सानिया और शोएब की शादी को लेकर हो हल्‍ला मचा हुआ है और देशभर में सानिया के फैसले से नाराजगी जताई जा रही है, उससे तो ऐसा लग रहा है जैसे सानिया दुनिया की आखिरी लड़की हो और उसने भी परीस्‍तान का कोई शहजादा चुन लिया हो और अब धरती लड़की विहीन हो गई हो। वैसे एक बात यह भी है कि अभी तक स्‍वयंवर सीरीज के तीसरे सीजन के लिए सिर्फ कयास ही लगाए जा रहे हैं, अगर तीसरे सीजन के बारे में सोचा जाए तो शोएब को प्रमुख दूल्‍हा मानते हुए राखी के स्‍वयंवर की तरह सानिया का स्‍वयंवर रचा जा सकता है। इस बार इसका नाम 'सानिया का स्‍वयंवर- दुनिया की आखिरी लड़की के लिए जंग' रखा जा सकता है। यह तो रही संभावना की बात, आगे सानिया के बहाने एक बेहद संजीदा मामला जो मेरे जहन में उठ रहा है उसे उघाड़े बिना न तो मुझे ही नींद आएगी और न ही आप इस ब्‍लॉग को पूरा मान पाएंगे।

सानिया के बहाने मुझे देश में गिरते सेक्‍स रेशियो (लिंग अनुपात) ने बेहद चिंतित कर दिया है। देश में हर 10 साल बाद जनगणना होती है और हर बार महिलाओं की संख्‍या पुरुषों की तुलना में कम होती जाती है। भई मैं तो उस दिन के बारे में सोच रहा हूं, जिस दिन प्रति हजार पुरुषों पर सिर्फ एक महिला रह जाएगी और जरा सोचिए कि वह स्थिति कैसी होगी जब पूरे देश में सिर्फ एक ही लड़की रह जाए। सच मानिए अगर ऐसा हो गया तो उसके लिए तलवारें खींचने वालों में मैं सबसे पहले होऊंगा। वैसे मैं ऐसा नहीं करुंगा क्‍योंकि मैं थोड़ा सा सौभाग्‍यशाली हूं क्‍योंकि सिर्फ दो माह बाद मेरी शादी है और वो दुनिया में अकेली लड़की नहीं है, जिसके लिए मुझे जंग लड़नी पड़े। सोचिए कि एक दिन ऐसा आ जाए, सानिया पूरे देश में इकलौती लड़की हो और वह भी एक पाकिस्‍तानी से शादी की बात कर रही हो, तो यकीन मानिए दोस्‍तो मैं, आप और हम सब शोएब के सामने ठीक उसी तरह खड़े हो जाते जैसे मुगलों के सामने महाराणा प्रताप या शिवाजी खड़े हुए थे। भले ही फिर हश्र जो होता लेकिन जब तक शरीर में खून का एक भी कतरा बचता सानिया के साए पर तक भी उसे नहीं पहुंचने देते। लेकिन दोस्‍तो अभी वह स्थिति नहीं आई है, इसलिए सानिया को अपनी मर्जी से शादी करने दो। इससे दुनिया में हमारे भद्र पुरुष होने का भी संदेश जाएगा। फिर भी आपको अगर अपनी भद्रता की कोई कद्र नहीं है तो लगे रहो, सानिया हाय हाय - हाय हाय - हाय हाय। वैसे दिल की बात बताऊं तो मैं भी ऐसे मामले में भद्र पुरुष नहीं कहलाना चाहता।

Monday, March 29, 2010

एक दफा जो तेरा नाम लिया तो सौ फसाने हुए

एक दफा जो तेरा नाम लिया तो सौ फसाने हुए
सब के सब हमारे जीने के बहाने हुए।
पहली बार जो तेरा नाम लिया तो हो गए बदनाम
जो सोचा, तुझे भूल जाऊं तो इल्जाम लगा और हो गए बेईमान
वैसे तो तुझे भूलाना भी नहीं है इतना आसान
पर करुं कैसे याद, दुनिया कर देती है बदनाम
सपनों में भी होते हैं तेरे ही कदमों के निशान
सच तुझे भूलाना नहीं बिल्कुल भी आसान
एक दफा जो तुझे याद किया तो सौ फसाने हुए
सब के सब हमारे जीने के बहाने हुए।