Thursday, January 28, 2010

दीवानों की तो मौजां ही मौजां

सवाल नैतिकता का नहीं दिल का है इसलिए भई मैं तो आज बहुत खुश हूं। खुश क्यों हूं? क्या सच में आप नहीं जानते कि मैं क्यों खुश हूं। अपने दिल से पूछिए जनाब! वो भी आज खुशी के मारे दुगुनी तेजी से धड़क रहा होगा। आपका दिल जानता है मेरी खुशी का राज, आप भी अगर जानना ही चाहते हैं तो बता देता हूं। अरे भई गुरुवार 28 जनवरी को आपने सुबह-सुबह टीवी पर खबर तो देखी ही होगी और न सही आज सुबह अखबार खंगाला होगा। एक ही तो हिला देने वाली खबर रही कल की और वो थी सानिया की सगाई टूट गई। अब बताओ इस खबर से खुशी मिली की नहीं। अब मेरी और सानिया के बीच में प्लीज नैतिकता की बात मत घुसेड़ना कि उसकी शादी टूट गई और तुम खुश हो रहे हो। भई हम तो ऐसे ही हैं, जो करते-कहते हैं सो डंके की चोट पर। अब सानिया की शादी सोहराब से नहीं होगी, जो उसके बचपन का दोस्त है। मतलब अब सानिया ज्यादा दिनों तक टेनिस खेल पाऐगी। क्यों याद नहीं आपको उसी ने तो कुछ दिन पहले कहा था कि शादी के बाद टेनिस छोड़ दूंगी। तो लो अब तो शादी ही टूट गई, मतलब हमारी यह टेनिस सनसनी कुछ दिन तक और टेनिस कोर्ट पर अपने जलवे बिखेरेगी। समझ गए हम आपकी मुस्कान को, इसीलिए मुस्कुरा रहे हो न कि भई वो कभी भी दूसरे-तीसरे दौर से आगे तो बढ़ती नहीं और तुम जलवे की बात कर रहे हो। दोस्त मैं तो इस टेनिस परी के हुस्न के जलवों की बात कर रहा था।

फिर बार-बार वो किसी न किसी कॉन्ट्रवर्सी में तो फंसती ही है। उन कॉन्ट्रवर्सीज का भई मैं तो चटखारे लेकर मजे लेता हूं। अगर हमारी सानिया की शादी हो जाती तो, भई मेरे तो चटखारे ही बंद हो जाते। मैं जानता हूं आपकी नैतिकता आपको इस ओर सोचने से भी रोकती है। चलिए कुछ पल के लिए नैतिकता को तिलांजलि देकर देखिए और सोचिए अब भी सानिया की कोई हॉट तस्वीर सामने आती है तो आप क्या करते हैं। क्यों अब मिली वही खुशी, जो उस तस्वीर को बार-बार घूरने से मिलती है। अब आपको मेरी खुशी का कुछ एहसास होगा, जो मुझे इस सनसनी की शादी टूटने से हुई है। भई दीवाने तो दीवाने हैं, इन्हें न घर चाहिए न दर चाहिए, मुहब्बत भरी एक नज़र चाहिए।

कभी अकेले में आपने पोर्न भी देखा ही होगा, मैंने भी देखा है और मुझे लगता है इसमें हर्ज ही क्या है। मेरी जिन्दगी का एक फलसफा है, जिसे में आपसे जाहिर करना चाहता हूं। मैं मानता हूं कि 'जिस भी काम से आपको खुशी मिले उसे करना चाहिए, भले ही वह नैतिक हो या न हो। आपको बस एक बात का ध्यान रखना है कि उससे किसी का नुकसान न हो।' कितनी ही ऐसी पोर्न साइट्स हैं जिन पर सानिया की तस्वीर देखते ही माउस क्लिक करना बंद कर देता है, आखिर क्यों? हमारी कल्पना में जो सानिया है, जो हमें कभी रतजगा कराती है तो कभी सपनों में घर कर जाती है, क्या शादी के बाद वह ऐसा असर छोड़ पाती? नहीं! इसलिए मैंने कहा कि भई मैं तो बहुत खुश हूं सानिया की शादी टूटने से। और मजेदार बात तो यह है कि अब वह ज्यादा दिनों तक टेनिस खेल पाएगी। जितना ज्यादा खेलेगी उतना ही उसके जीतने के अवसर बढ़ेंगे, हमारे उसे देखने के मौके बढ़ेंगे, दिल को धड़कने के बहाने मिलते रहेंगे, टीवी-अखबारों को उसकी कॉन्ट्रवर्सीज से टीआरपी बढ़ाने के बहाने मिलते रहेंगे और हां वेबसाइट्स को तस्वीरों का मसाला व माउस के क्लिक को खराब होने का बहाना भी मिलता रहेगा। तो सानिया हैप्पी ब्रोकेन मैरिज! फॉर ऑल योर लवर्स।

Wednesday, January 27, 2010

...तो भारत-पाक हैं ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार

जी हां दोस्तो! पहले पहल जब मुझे इसी हैडिंग से कुछ-कुछ मिलती जुलती हैडिंग आज सुबह अखबार में पढ़ने को मिली तो मैं एक बार के लिए चौंक गया। असल में अखबार की हैडिंग कुछ इस तरह थी 'भारत-पाक परमाणु युद्ध से ठंडी हो सकती है जलवायु।' इस हैडिंग को पढ़ने के बाद पहली प्रतिक्रिया जो मेरे मन आई वह यही थी कि यह बात सही है कि ये दोनों देश ही ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं। पहला कारण तो हम सब जानते ही हैं कि इन दोनों के रिश्तों में हमेशा तल्खी रहती है और आए दिन कहीं न कहीं बम विस्फोट की घटनाएं भी सुनाई ही देती हैं। इसके अलावा बार्डर पर गोलीबारी की घटनाएं तो आम बात हैं और दोनों तरफ के नेता और सैन्य अधिकारी जिस तरह से गाहे-बगाहे एक दूसरे की तरफ आग उगलते हैं उससे सियासी माहौल ही गर्म नहीं होता बल्कि वो ग्लोबल वार्मिंग का कारण भी बन सकता है।

इन दोनों देशों को ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार ठहराने का दूसरा कारण यह है कि दोनों देश दक्षिण एशिया के मजबूत देश हैं और पाकिस्तान न सही भारत दुनिया की सबसे तेज उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हो न हो हम एक दिन क्रिकेट की तरह ही दुनिया की महाशक्ति बनने की कुव्वत रखते हैं। जब हमारा भविष्य इतना शानदार दिखता हो तो जाहिर सी बात है कि कुछ मौजूदा शक्तियां हमें पीछे धकेलना चाहेंगी। सच्चाई यही है कि जो भी ऊंचाई पर होता है वह नहीं चाहता कि दूसरा उसे पछाड़कर उससे आगे निकल जाए। खैर मुद्दे की बात पर आते हुए बता दूं कि इस पैराग्राफ में जो लिखा है उसका संबंध पूरी तरह से उस खबर से है जिसको देखकर मैं यह लेख लिखने बैठ गया।

खबर के कुछ अंश आपको बताऊं तो वह कुछ इस प्रकार थीः परमाणु अप्रसार और निरस्त्रीकरण पर जापान और आस्ट्रेलिया की एक संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध हुआ तो इसके कारण जलवायु बेहद ठंडी हो सकती है और दुनियाभर में खेती-किसानी पर इसका विनाशक असर पड़ सकता है। ... भारत-पाक के बीच परमाणु जंग में दोनों देश एक दूसरे के प्रमुख शहरों पर कम असर के हिरोशिमा आकार के हथियारों से हमला करते हैं तो समताप मंडल में जमा हुए धूल-धुएं और रसायनों के बादल वहां लम्बे समय तक ठहर सकते हैं जिससे दुनियाभर में मौसम ठंडा हो जाएगा। ... परमाणु युद्ध से पैदा हुआ विशाल मलबा और धुंआ सूर्य की रोशनी को दशकों तक रोक सकता है और नजीजतन पृथ्वी पर जबर्दस्त ठंड पड़ सकती है।

अब सोचिए कि तकनीक में अपनी श्रेष्ठता साबित कर चुका जापान ऐसी तकनीकी इजात कर ले जिससे जबर्दस्त ठंड के बीच भी कृषि की जा सकती हो तो क्या होगा? दुनियाभर में हो हल्ला मचाने के बावजूद ग्लोबल वार्मिंग का कोई ठोस उपाय न मिल पाने के कारण सभी परेशान हैं। ऐसे में ताजा शोध पर अमल करके यदि ग्लोबल वार्मिंग से निजात मिल सकती है और धरती पर जबर्दस्त ठंड पड़ सकती है तो हो सकता है आज के तथाकथित विकसित और अग्रणी देश भारत-पाक को परमाणु युद्ध में झौंक दें। कुल मिलाकर बात वहीं आती है कि जब तक भारत-पाक के बीच परमाणु युद्ध नहीं होता, तब तक ग्लोबल वार्मिंग का कोई हल दुनिया के पास नहीं है। मतलब साफ है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए भारत-पाक ही जिम्मेदार हैं। इसलिए उन्हें बार्डर पर छिटपुट गोलीबारी और शहरों में छोटे-बड़े धमाके करने की बजाए दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के लिए परमाणु युद्ध की घोषणा कर देनी चाहिए।

Thursday, January 21, 2010

लैंडलाइन से भी झूठ बोल पाएंगे, अब हुई न असली आजादी

दोस्तो पिछले दिनों दो खबरें पढ़ी, जिनमें से एक तो यह कि अब ट्राई (टेलीफोन रेग्यूलेटरी अथारिटी ऑफ इंडिया) मतलब जो संस्था फोन कंपनियों पर नकेल कसने का काम करती है, अब लैंडलाइन के नंबरों को भी दस डिजिट का करने पर विचार कर रही है। दूसरी के बारे में नीचे बात करेंगे। पहली खबर जब मैंने पढ़ी तो मुझे झट से अपने दो क्लासमेट्स और एक सहकर्मी की याद आ गई। ये दोनों झूठ बोलने इतने माहिर हैं कि इन दोनों को ही एक दूसरे ने कड़ी टक्कर दी हुई है। इतना ही नहीं यह खबर पढ़ते ही मन में एक और बात सोचकर मैं मन ही मन मुस्कुराने लगा। जो बात मुझे मुस्कुराने पर मजबूर कर रही थी वह असल में यह थी कि अब लोग घर बैठकर लैंडलाइन से भी झूठ बोल सकते हैं।

अभी शायद आपके समझ में यह बात नहीं आ रही है कि जैसा ट्राई सोच रही है वैसा होने पर लोग लैंडलाइन से कैसे झूठ बोल पाएंगे। तो जनाब कभी बाल कटवाने या दाढ़ी बनावाने के लिए नाई की दुकान पर बैठे जाइए और देखिए कि हजामत बनवाते-बनवाते लोग कैसे मोबाइल पर जरूरी मीटिंग में हूं, दिल्ली से बाहर गया हूं, अभी तो मैं फलां फलां जगह हूं कहते हुए दूसरी तरफ वाले की हजामत करते हैं। ऐसा नहीं है कि यह अकेली जगह है जहां ऐसे झूठ बोले जाते हैं, यही नजारा आपको सड़क पर चलते हुए, बस में, ट्रेन में, ऑफिस में मतलब कहीं भी देखने को मिल जाएगा। क्योंकि मोबाइल का एक ठिकाना नहीं होता इसलिए आपका मन जहां करे बता दीजिए मैं वहां हूं, सुनने वाला विश्वास करे न करे उसके पास दूसरा उपाय भी नहीं होता है। लेकिन लैंडलाइन के मामले में बात दूसरी थी, क्योंकि इससे अगर आप किसी को फोन करते हैं तो वहां का स्थानीय कोड भी चला जाता है। मतलब आप चाहकर भी झूठ नहीं बोल सकते और हां अगर कोई फोन करे और आप उठा लें तो यह तय है कि आप घर पर ही हैं।

अब सोचिए कि लैंडलाइन भी अगर 10 डिजिट के हो गए तो उन झूठ के सरताजों के लिए कितनी सहूलियत हो जाएगी। अब तो वे बिस्तर में लेटे हुए लैंडलाइन से अपने बॉस से बात करेंगे और कहेंगे सर मुझे अचानक मम्मी-पापा के साथ हरिद्वार जाना पड़ा। या दरवाजे पर खड़ी अपनी गर्लफ्रैंड से बचने के लिए डार्लिंग मैं तो अभी मंदिर में हूं।

दूसरी खबर यह थी कि अब आपकी लिखावट आपके झूठ का राज खोल सकती है। इस खबर में वैसे तो कुछ खास बात नहीं थी लेकिन जब पहली खबर के साथ इसे जोड़कर देखा तो सोचा वाह! क्या बात है फोन पर झूठ बोल-बोलकर टर्काते रहो, सामने आने की जरूरत ही क्या है। न आपना सामना होगा और न ही झूठ से पर्दा उठेगा। जब झूठ बोलने की कला आती ही है तो लिखावट का भी कुछ न कुछ कर ही लिया जाएगा। अगर आप कुछ करते नहीं बनेगा तो कोई न कोई ऐसी टेक्नोलॉजी युक्त पेन भी आ ही जाएगा जो सफाई से झूठ लिखने में मदद कर दे। टेक्नोलॉजी के लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं है और ऐसी तकनीक जिस दिन भी आ जाएगी उस दिन यह खुशखबरी मैं भी अपने ब्लॉग पर आपको जरूर दूंगा। झूठ के सरताजों को बेस्ट ऑफ लक!

पहाड़ों के जीवन का दूसरा पहलू, अभाव में जीता पहाड़



पहाड़ों का जिक्र आते ही अक्सर जेहन में सबसे पहले मसूरी, नैनीताल, शिमला, कुफरी, या कश्मीर के किसी हिलस्टेशन का नाम आता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि इनकी खूबसूरती की तरफ हर साल लाखों लोग आकर्षित होते होकर यहां पहुंचते हैं। जाहिर है आप भी कई बार इनमें से कुछ वादियों में भटके होंगे और कभी मौका नहीं मिला तो जागती आंखों से सपनों में ही इनका दीदार कर लिया होगा। अब सोचिए जिसका जन्म ही खूबसूरत वादियों में हुआ हो उसके लिए इन वादियों का कितना महत्व होगा। शायद वह इन वादियों को उस नजर से न देखे जिस नजर से एक पर्यटक यहां जाकर देखे। इसलिए तो इस बार की सर्दियों में मुझे अपने गांव जाने का मौका मिला तो मैं दुखी हो गया। पहले तो बता दूं कि मेरा गांव उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में रानीखेत से करीब 35 किमी दूर चमड़खान और भिकियासैण के बीच में है और गांव का नाम है नैटी। अब आप कहेंगे कि अपनी जन्मभूमि गया और इतनी खूबसूरत जगह जाकर भी दुखी क्यों हुआ होगा। तो इसका जवाब आपको नीचे मिल जाएगा।

दिसम्‍बर के पहले हफ्ते में एक बार फिर पहाड़ जाने का मौका मिला। मौका था, बड़ी मॉसी के बेटे की शादी। पहले पहल तो पहाड़ों में एक बार फिर कुछ दिन बिताने के एहसास ने ही मन में रोमांच पैदा कर दिया। खैर वो वक्‍त भी आ गया जब मैं और मां पहाड़ की गाड़ी पर सवार होकर वहां के लिए चल दिए। मन में कई रंग-बिरंगे खयाल आ रहे थे, 'पहाड़ में इस समय कितनी हरियाली होगी, क्‍या सुंदर नजारे होंगे, क्‍या कड़ाके की ठंड होगी, दिन में धूप में बैठना कितना अच्‍छा लगेगा, सुबह-सुबह गरम पानी से मुंह-हाथ धोने में कितना अच्‍छा लगेगा वगैरह वगैरह। इन्‍हीं खयालों की राहों में भटकते हुए कब गाजियाबाद, मुरादाबाद, काशीपुर, रामनगर और फिर कॉर्बेट पार्क निकल गया पता ही नहीं चला। शायद मैं भी कुछ-कुछ उसी पर्यटक की तरह पहाड़ को मन में बिठाए था जो कभी-कभी छुट्टियां मनाने पहाड़ों की तरफ चल देते हैं। लेकिन यहां एक अंतर था, अक्‍सर वो पर्यटक गर्मियों में पहाड़ का नजारा करने जाते हैं जबकि मैं सर्दियों में आया था। उन पर्यटकों से अलग मुझे पहाड़ के जीवन की दुस्‍वारियों में बारे में भी शायद कुछ ज्ञान था।

इस बार गांव गया तो पहले से ही मन में एक विश्‍वास था कि सर्दियों का समय है कम से कम इस समय तो पानी की कि‍ल्‍लत नहीं होगी। लेकिन गांव पहुंचकर जो नजारा देखा वो मुझे सपनों से जगाने के लिए काफी था। गांव में ही बनी टंकी में कभी पानी ज्‍यादा हो जाए तो ओवर लोड होने वाले पानी के लि‍ए ठीक उसी टंकी के नीचे दूसरी टंकी बन रही थी। ओवरलोड पानी के लिए दूसरी टंकी बन रही थी इसका मतलब यह कतई नहीं है कि सब कुछ ठीक-ठाक था। सरकारी प्‍लमर गांव में आया तो समझ आया कि असल में स्रोत से पानी कम आ रहा है और उसे गांव से एक वालंटीयर चाहिए जो उसके साथ स्रोत तक जाकर नल की मरम्‍मत करने में मदद कर दे। खैर यहां तो वालंटीयर मिल गया और शाम तक पानी दुरुस्‍त भी हो गया। अगले दिन अपने गांव के ऊपर वाले गांव (बंगोड़ा) में चला गया तो वहां पानी की टंकी का नजारा देखकर मैं दंग रह गया। टंकी को देखकर अखबार की वही घिसी पिटी हैडलाइन याद आई 'पानी पर पहरा'। जी हां पानी पर पहरा, यहां नल पर एक टिन के डिब्‍बे को कुछ इस तरह से ताला लगाया गया था जिससे कोई वहां से ज्‍यादा पानी न ले सके। फिर एक खयाल आया कि जब सर्दियों में ये हाल है तो गर्मियों में क्‍या होगा।

पहाड़ सुंदर हैं, हरे-भरे हैं, यहां पर्यटक छुट्टियां बिताने आते हैं, यहां के लोग बहुत अच्‍छे हैं, यहीं पर ज्‍यादातर नदियों का उद्गम स्‍थल है मतलब ज्‍यादातर नदियां यहीं से पैदा होती हैं और मैदानों की प्‍यास बुझाती हैं। पहाड़ सुंदर हैं इसमें किसी को भी कोई शक नहीं होना चाहिए, वैसे भी सुंदरता तो देखने वाले की आंखों में होती है। हरे-भरे हैं यह भी सच है, इसे पहाड़ के लोग ज्‍यादा अच्‍छी तरह से जानते हैं क्‍योंकि जंगल घर के पास तक पहुंच चुका है और जंगली जानवर बाघ (वो तो अब लुप्‍तप्राय है), सूअर, भालू घरों तक आ जाते हैं। जंगल हरे-भरे जरूर हैं लेकिन खेतों में सुअर हरियाली को रहने नहीं देते, इसलिए ग्रामीण जंगलों को कब तक हरा रहने देंगे इसकी कोई गारंटी नहीं।

पर्यटक यहां छुट्टियां बिताने जरूर आते हैं लेकिन यहां पलायन का मंजर ऐसा है कि गांव के गांव खाली हो चुके हैं। राज्‍य को बने 9 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन कोई भी ऐसी कारगर नीति अभी तक राज्‍य सरकार नहीं बना पाई जिससे पलायन को रोका जा सके। कोई बाखेली (एक लाइन में बने कई मकान एक साथ) जो कभी बच्‍चों की किलकारियों और शाम को चाय के समय जमती महफिलों से गुलजार रहा करती थी आज उनमें से बमुश्किल कोई एक घर के ही दरवाजे खुले मिलते हैं। चैत्र मास की रातों में झोड़े और सर्दियों की लंबी रातों में आण काथ में जहां रतजगा हुआ करता था वहीं अब अंधेरा होते ही गांव में वीराना पसर जाता है। जो कुछ लोग गांव में बच गए हैं वे भी एक दूसरे के घर पर महफिल जमाकर बैठने की बजाए अपने घर में ही सास-बहू के नाटक में मशगुल रहना ज्‍यादा पसंद करते हैं।

अब कहें क्‍या अब भी पहाड़ों को सिर्फ हरा-भरा, सुंदर और सैलानियों की आरामगाह कहा जाना ठीक होगा। क्‍या अब भी यह भरोसा किया जा सकता है कि गंगा, यमुना जैसी बड़ी-बड़ी नदियां इन्‍हीं पहाड़ों से निकली होंगी। शायद इस बार मैंने पहाड़ों को ज्‍यादा करीब से जाना और वहां के जीवन को समझने की तरफ एक कदम बढ़ाया। बरसात की कमी के कारण ज्‍यादातर जल स्रोत सूख चुके हैं और खेतों में फसल पहले ही नहीं हो रही थी और अब भालू व सुअर भी उन्‍हें नष्‍ट करने आ पहुंचे हैं। अभावों के बीच जीता पहाड़ी जीवन अक्‍सर अपने ही अभावों से हारने को मजबूर रहता है।