Thursday, July 30, 2020

बिखरा नहीं हूं, बस थोड़ा सा टूटा हूं...

बिखरा नहीं हूं,
बस थोड़ा सा टूटा हूं।
किसी ने रौंदा नहीं,
बस थोड़ा पीछे छूटा हूं।

फिर उड़ान भरुंगा,
फिर आसमान छुऊंगा।
पतंग की डोर थोड़े ही हूं
जो कटकर गिर जाऊंगा।

नई हमारी परवाज होगी,
मंजिलों से आवाज होगी।
तुम्हारा ही तो इंतजार था,
जीत वो लाजवाब होगी।

हम बिखरें भी तो,
जश्न-ए-बहारा होता है
बीज बनकर गिरते हैं और...
गुलशन का नजारा होता है।

तुम क्या तोड़ोगे हमें,
हम खुद ही टूट जाते हैं।
प्यार से कोई गले लगा ले बस
हमेशा के लिए उसके हो जाते हैं।

Friday, June 5, 2020

मैं बुलाऊंगा तुम्हें ऐ दोस्त तुम चले आना

मैं बुलाऊंगा तुम्हें ऐ दोस्त
तुम चले आना।
खुशियां जो पीछे छूट गईं थीं,
उन्हें साथ में लाना।
अकेले तुम्हें घर में एंट्री मिलेगी नहीं,
भाभी को भी संग लाना।

मैं बुलाऊंगा तुम्हें ऐ दोस्त
तुम चले आना।
खुशियां जो पीछे छूट गईं थीं,
उन्हें साथ में लाना।
आ ही रहे हो तो एक गठरी भरकर
बचपन की यादें भी लाना।
बचपन की यादों में खो जाएंगे हम,
कुछ पुराने किस्से ले आना।

खुशियां जो पीछे छूट गईं थीं,
उन्हें साथ में लाना।
तुम आओगे तो महफिल सजेगी,
दो बियर भी ले आना।

मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा

लौट आऊंगा मैं एक दिन,
फिर उत्सव मनाऊंगा।
नवरात्र पर व्रत-पूजा करके,
कंजक भी सजाऊंगा।

रक्षाबंधन के त्योहार में,
बहनों संग खूब प्यार लुटाऊंगा।
आएंगे कान्हा भी हमारे घर,
जन्माष्ठमी का त्योहार मनाऊंगा।

मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा।

सफाई के लिए जुटाऊंगा सबको,
स्वछता का मंत्र भी सिखाऊंगा।
फिर होगी दोस्तों संग हंसी-ठिठोली
लॉन्ग ड्राइव पर भी ले जाऊंगा।

गजनान को भी घर बुलाएंगे,
गणपति बप्पा मोरया चिल्लाऊंगा।
लौट आएगी वो खोई रंगत एक दिन
मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा।

बड़ा दुखी था मैं इस साल,
अगले बरस बिटिया का जन्मदिन धूम-धाम से मनाऊंगा।
कोरोना के रावण का दहन करके
हर्षोल्लास से दीपोत्सव मनाऊंगा।

बच्चों में खुशियां बांटने को,
सेंटा बनकर आऊंगा।
नए साल का स्वागत भी होगा
दोस्तों संग कुछ जाम भी छलकाऊंगा।

मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा।

पंचमी पर मां शारदा की पूजा कर,
तिल-कुट का भोग लगाऊंगा।
और फिर फाग में रंग-गुलाल उड़ाकर,
दोस्तों संग होली खूब मनाऊंगा।
मैं फिर खूब उत्सव मनाऊंगा।

जी, बॉस दफ्तर भी आऊंगा
आपके साथ चाय पर चर्चा कर
बोर्ड रूम की लंबी मीटिंग में,
आगे का प्लान भी बनाऊंगा।

सुना था तू है, बचपन से मानता आया हूं के तू है

सुना था तू है,
बचपन से मानता आया हूं
के तू है।

तू है तो अपने होने का सुबूत दे
बचपन से ये मानता आया हूं
के तू है।

तू है तो क्यों भूखा मर रहा इंसान,
क्यों दर-बदर भटक रहा बेजान।
क्यों दाने-दाने वो मोहताज है,
इतने पर भी तुझे न लाज है?

मंदिर तेरे, मस्जिद तेरी
गुरुद्वारे और गिरिजाघर भी तेरे
फिर भी क्यों
भूखा पटरियों पर भूखे मर रहा इंसान

क्या तू भी अपने घर मैं कैद है?
क्या तुझे भी महामारी का डर है।
कहीं तू भी भूखा तो नहीं रह गया।
ले तू भी कुछ दिन का राशन ले जा।

मगर सुन, पैदल मत चल पड़ना,
अपने घर की तरफ
गर्मी बहुत है, पैर जल जाएंगे तेरे भी
रेल की पटरी से तो भी दूर रहना।

घर में तेरे भी कोई राह देखता होगा,
जो तिनका-तिनका बिखर गया,
सोच उसके घर वालों का क्या होगा?
तू भी ऐसे ही न मर जाना।

लड्डू-प्रसाद का भोग लगाया कभी,
कभी चढ़ावा भी चढ़ाया तेरे दर पर।
अब बारी तेरी है,
क्या ऐसे ही छोड़ देगा मुझे दर-बदर।

Tuesday, March 24, 2020

बस कर तू भी बावली ना हो जाना, ये नफरत नहीं तेरा प्यार है

आज वो बड़ी खुश है
या बड़ी ही व्याकुल
आंगन तक आ गई मेरी
कह रही है चल बाहर निकल।

सड़क वीरान है
चिड़िया वो नादान है
चिल्ला चिल्ला कर कह रही
चल लौंग ड्राइव पर चलें।

अधीर है बेचारी
समझ नहीं पा रही
मैं घर में क्यों पड़ा हूं
बाहर आने की जिद कर रही

अकेली नहीं
दूसरे साथियों को भी लाई है
सब आज कलरव करते हैं
जैसे मेरी गुलाम मजबूरी पर हंसते हैं।

या अपनी आजादी का जश्न मना रहे
मेरे जख्मों को कुरेद रहे
मै कैद हुआ तो हवा भी बावली हो गई
आंधी बनकर मुझे चिढ़ाने अंदर तक आ गई।

बस कर तू भी बावली ना हो जाना
ये नफरत नहीं तेरा, प्यार है चिड़िया
बिछड़कर मैं भी रोया हूं कभी बहुत
अब तू 'जीना' मत छोड़ देना चिड़िया।

(c) दिगपाल सिंह

Sunday, March 22, 2020

अजब ये संक्रमण काल है


रास्ते सूने, सड़कें सूनी हैं
अजब ये संक्रमण काल है।
हम भी, तुम भी घर में बंद हैं,
कोरोना आया बनकर काल है।

कंकर भी न हिला आज रास्ते से,
सड़कें भी विधवा सी सूनी हैं।
तुम घर में रहो, सदा खुश रहो
तुमसे देश को उम्मीदें दूनी हैं।

पंछी, नदिया सब आगे बढ़ गए
आज हम अपने ही घर की सीढ़ियां चढ़ गए।
रास्ते सूने, सड़कें सूनी हैं,
बता तो फिजाओं को हम भी जुनूनी हैं।

अब हमने रार ठान ली है,
काल के कपाल पर नई इबारत लिख देंगे।
यू न हमारी हस्ती को मिटा पाएगा कोई,
हर मुसीबत को राह से हटाकर ही मानेंगे।

(c) दिगपाल सिंह

Wednesday, February 26, 2020

ये कौन है जो पत्थर फेंक रहा, कौन है जो आग लगा रहा है

ये कौन है जो पत्थर फेंक रहा है,
इंसानियत को लहूलुहान कर रहा है।
ये कौन है जो आग लगा रहा है।
दुकानों ही नहीं भाईचारे को भी जला रहा है।

क्यों सड़कों पर बिखरा कबाड है,
क्यों दंगों से जिंदगी यूं बेजार है।
घर लौट जा तुझे भी कहता हूं मैं,
ये राह और उसके आगे मोड़ बेकार है।

कौन सा खुदा है जो पत्थर फेंकने को इबादत कहता है,
कौन वो भगवान है जो आगजनी पर खुश होता है।
कुछ लोगों के बहकावे पर भड़क जाती हैं भावनाएं तेरी,
'जीना' नहीं चाहता क्या, बहुत कीमती है जिंदगी तेरी-मेरी।

यूं न कर इंसानियत को शर्मसार,
चल फिर गले मिलते हैं मेरे यार।
तू ईद पर मुझे सेवईंया खिला
मैं होली पर रंग के तुझपर बरसाऊं प्यार।
@दिगपाल सिंह जीना

Friday, February 21, 2020

सबके भेद खुल गए, रंगे सियार धुल गए

सबके भेद खुल गए,
रंगे सियार धुल गए।
असली रूप में आए नजर
अब एक-एक होगा दर-बदर।

चेहरे से नकाब उतर गया,
गद्दारों का मुखड़ा दिख गया।
कोई भारत के टुकड़े कर रहा,
कोई दुश्मन जिंदाबाद कर गया।

जागी सतायों के लिए उम्मीद ऐसी,
घर और दिल में जगह दिलाएगा CAA-NRC
अब अपना भी हंसता खेलता परिवार होगा,
 देश की खुशहाली में मेरा भी अधिकार होगा।

ये खुशी गद्दारों को ना हज़म हुई,
विरोध के नाम पर देश तोड़ने की बात हुई।
और इस तरह रंगे सियार धुल गए,
भेद उनके सारे खुल गए।